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कन्दीय फसलों पर मंथन

| June 19, 2012 | 0 Comments

राष्‍ट्रीय संगोष्ठी  में हुए तीन तकनीकी सत्र

udaipur. एमपीयूएटी के राजस्थान कृषि महाविद्यालय में चल रही अखिल भारतीय कन्द फसल अनुसंधान परियोजना के दूसरे दिन तीन विभिन्न तकनीकी सत्रों में मुख्य कंद फसलों शकरकंद, रतालू, कसावा, अरवी, सुरन, आदि के अनुसंधान पर देश भर के विशिष्ठ वैज्ञानिको द्वारा गहन विचार मंथन किया गया|

प्रथम तकनीकी सत्र शस्य तकनीक पर आयोजित किया गया| सत्र की  अध्यक्षता एमपीयूएटी के निदेशक अनुसंधान डॉ. पी. एल. मालीवाल ने की| कसावा जिससे की साबूदाना बनाया जाता है, में प्रूनिंग तथा उर्वरक प्रवंधन पर दक्षिण भारत के लिए अनेक अनुशंसाएं अनुमोदित की गई| उदयपुर केंद्र पर शकरकंद, तथा रतालू में अनुसंधान के महत्व को देखते हुए इन्हें सम्पूर्ण राष्ट्र में विशेष रूप से उत्तर भारत के लिए जिम्मेदारी दी गयी| किसानों की समस्याओं को देखते हुए समन्वित पादप पोषण की अनुशंसा की गयी | इसी के साथ जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए कसावा की फसल की विभिन्न किस्मों का परीक्षण किया गया जिससे यहां भी साबूदाना उत्पादन की ओर कदम बढ़ाये जा सकेंगे|
दिन के दूसरे सत्र में कीट-व्याधियों के प्रवंधन पर डॉ. आनंदराज निदेशक, भारतीय मसाला अनुसंधान कालीकट के निर्देशन में विगत वर्षों के अनुसंधान पर गहन विचार-विमर्श किया गया | सत्र में विभिन्न कंद फसलों के मोलिकुलर मार्कर तथा जैव तकनीक प्रोधिगिकी के कार्यों को कल्याणी, कोलकाता के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जयंत तरफदार ने प्रस्तुत किया | इसके बाद इन फसलों के प्रसार कार्यक्रमों की समीछा करते हुए तीसरे सत्र में डॉ. इन्द्रजीत माथुर ने विभिन्न ट्रेनिंग कार्यक्रमों के आयोजन का सुझाव दिया | उन्होंने कहा की इस तरह के अनुसंधान का तभी होगा जब इससे कृषि विज्ञानं केन्द्रों को जोड़ा जायेगा तथा तकनीकों को किसानो तक पहुचाया जायगा | परियोजना समन्वयक डॉ.  जेम्स जोर्ज ने कहा की भविष्य की सभी अनुसंधान योजनाऐ जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए ही बनेंगी | आयोजन सचिव डॉ. सुनील पारीक बताया की उदयपुर में शकरकंद की १०० विभिन्न किस्मे विश्व आलू अनुसंधान संस्थानों से लाकर लगाई गयी है तथा उन पर परिछन किया जा रहा है

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Category: News

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