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नाटक ‘दुल्हन एक पहाड़ की’ के एक के बाद दो सफल मंचन

| February 9, 2018 | 0 Comments

उदयपुर। नाट्यांश सोसाइटी ऑफ ड्रामेटिक एंड परफोर्मिंग आर्ट्स के कलाकारों ने दी नाटक ‘दुलहिन एक पहाड़ की’ दो प्रस्तुतियां। इसाबेल एंड्रूस द्वारा लिखित और मृदुला गर्ग द्वारा अनुवादित नाटक ‘दुल्हन एक पहाड़ की’ एक ऐसी लड़की पर आधारित है जो पहाड़ों पर रहती है और जो कभी बंदिशों मे नहीं रही।

शादी के बाद घर कि बंदिशों और पंपरायें उसे बंधना चाहती है। समय के साथ वो इन सभी बन्धनों को अपनआने के साथ साथ अपने दृढ़ निश्चय, इच्छाशक्ति और मजबूत विचारो के बल पर वो बदलाव लाती है। यह नाटक आज के समय से 30-35 साल पुराना होने के बाद भी आज भी उतना ही सटीक और सही है जितना उस समय में। बंधन हमेशा से ही औरतो पर ही रखे जाते है फिर चाहे वो समाजिक हो, पारिवारिक हो या व्यक्तिगत। इन सभी बन्धनों के होने के बाद भी समय के बदलाव के साथ वैचारिक बदलाव होने लगता है| और असे हर बदलाव में कई साडी अच्छी बातें निहित होती है।
इसाबेल एंड्रूस द्वारा लिखित और मृदुला गर्ग द्वारा अनुवादित इस नाटक का निर्देशन रेखा सिसोदिया ने किया है। मंच पर कलाकारों में दुलहिन के किरदार में पलक कायथ, दादीजी के किरदार में निधि पुरोहित एवं सीता श्रीमाली, माँ के किरदार में स्वयं रेखा सिसोदिया व पड़ोसन के किरदार में श्वेता बावा ने अपने अभिनय से नाटक का भावपूर्ण सन्देश दर्शकों तक पहुँचाया। मंच पार्श्व में नाटक में संगीत संयोजन और संचालन अब्दुल मुबीन खान, प्रकाश संयोजन और संचालन अशफ़ाक नूर खान, रूप सज्जा योगिता सिसोदिया, सह निर्देशक मोहम्मद रिज़वान मंसूरी और मंच सहायक मोहन शिवतारे का भी सहयोग प्राप्त हुआ।
सार : नाटक घर के रोज़मर्रा के काम काज से शुरू होता है जहा एक तरफ माँ घर के सभी कामो को जल्दी जल्दी खत्म करने मे लगी हुयी है वही बूढ़ी दादी तन्मयता से चरखा चलाती रहती है। इन दोनों की पूरी जिंदगी इसी घर मे गुजरी है और अंधेरे की इतनी आदी हो गयी है की वो रोशनी की एक किरण भी बर्दाश्त नहीं कर पाते इन्होने अपने हालातो से इस कदर समझोता कर लिया है कि हर साल समय के साथ होने वाले बदलाव इन्हें नहीं पसंद आते। इन दोनों का बहरी दुनिया से जुड़ने का एक ही जरिया है वो है इन कि पड़ोसन। पड़ोसन बहुत ही मनोरंजक, हर काल और हर घर में पाई जाने वाली जो हर अच्छी बुरी सभी तरह कि बात करती है। जो सब कुछ जानते हुये भी अनजान रहती है। उसकी यह आदत माँ को बिलकुल पसंद नहीं पर लोक-हलाज के कारण कुछ कहती नहीं। नाटक के केंद्र में है युवा दुल्हन। उसमें द्वंद भी है, आजाद ख्याल खुशमिजाज नादाण प्रकृति। दुल्हन की परवरिश खुले माहौल में हुयी है जहां उसे कुछ भी करने और अपनी तरह से जिंदगी जीने की पूरी आजादी थी। दुल्हन जब पहली बार अपने ससुराल मे प्रवेश करती है तो अंधेरे की वजह से उसको घुटन महसूस होती है और जब वो दरवाजे और खिड़की खोलकर रोशनी को भीतर लाने का प्रयास करती है तो माँ और बूढ़ी दादी उसे मना कर देते है यह कहकर की आज तक इस घर मे ऐसा नहीं हुआ इसलिए आगे भी नहीं होगा। घरवाले उसे रीति रिवाजों में बांधने की, परिवार और पति तक सीमित रखने की कोशिश करते है। दुल्हन धीरे-धीरे खुद को नए परिवेश मे ढ़ालती है, नए घर के तोर तरीको और परम्पराओ को अपनाती है लेकिन खुद के ‘स्व’ और ‘अस्तित्व’ को बर्करार रखते हुये। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और मजबूत विचारों के बल पर बन्दिशों के होते हुए भी घर में बदलाव लाती है। उसे इस बात का डर नहीं है की लोग क्या कहेंगे। उसके हाथ में एक किताब है और एक संकल्प है, रोशनी का।

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