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राज्य को मिल रहे 236 करोड़, माफिया की जेब में 2000 करोड़ : मीणा

| April 21, 2018 | 0 Comments

रेत खनन पर समस्याएं और उसके विकल्प पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला प्रारम्भ

उदयपुर। सांसद अर्जुनलाल मीणा ने कहा कि दूसरे राज्यों से प्रेरणा लेकर हम किस तरह अपने राज्य में लागू कर सकते हैं, इस पर जरूर विचार किया जाना चाहिए। राज्य को 236 करोड़ का राजस्व मिल रहा है जबकि 2000 करोड़ माफिया की जेब में जा रहा है। विशेषकर टीएसपी क्षेत्रों में पंचायत, ग्राम पंचायत, स्वयंसेवी समूह को अधिकार दे और कहां विभाग उस पर निगरानी रखे।

वे शनिवार को माइनिंग इंजीनियर्स एसीसीएशन ऑफ इंडिया राजस्थान चेप्टर की ओर से खान एवं भू विज्ञान विभाग और सीटीएई के खान विभाग के सहयोग से रेत खनन पर समस्याएं और उसके विकल्प पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।
इस अवसर पर एक पत्रिका और सीडी का विमोचन भी किया गया जिसमें दो दिन में पढ़े जाने वाले पत्रों को शामिल किया गया है। अतिथियों संासद अर्जुनलाल मीणा, नीति आयोग के संयुक्त सचिव विक्रम सिंह गौड, सीटीएई के डीन डाॅॅ. एस.एस.राठौड़,एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरूण कोठारी, कुलपति प्रो. उमा शंकर शर्मा, हिंदुस्तान जिंक के सीईओ सुनील दुग्गल, खान एवं भू विज्ञान विभाग के निदेशक डीएस मारू के अलावा आरसी कुमावत, दीपक शर्मा आदि ने विमोचन किया।
सांसद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की रोक से पहले 500 और अब 1200 रुपये प्रति टन बजरी बिक रही है। केंद्र सरकार इस में आगे बढ़कर काम करंे। कार्यशाला की सफलता तभी है जब इसमें लिए गए निर्णय पर सरकार मान लें और आम आदमी को फायदा पहुंचे।
अध्यक्षता करते हुए नीति आयोग के संयुक्त सचिव विक्रम सिंह गौड़ ने कहा कि माइनिंग लॉबी पर्यावरण नियमों का पालन करना चाहिये। कुछ ज्यादा पैसा खर्च भी होगा तो वो आपको वापस अधिक ही मिलेगा। नियमों का पालन करते हुए काम करें ताकि आगे जाकर बाद में तकलीफ न देखनी पड़े। बड़ी बड़ी माइंस प्रदूषण नियंत्रण, पर्यवरण सरंक्षण, संवर्धन के लिए बहुत अच्छा काम कर रही हैं। सोच बदलने की जरूरत है। चाइना की जीडीपी में माइनिंग का 7, ऑस्ट्रेलिया का 11, भारत में 1.3 प्रतिशत योगदान है। पर्यावरण ऑथोरिटी और माइनिंग लॉबी के बीच जो खाई है, दोनों को पास में आना होगा तभी देश का हित होगा। कुछ इनोवेटिव वे में सोचने की जरूरत है कि किस प्रकार इस समस्या को दूर किया जा सकता है। कोयले को छोड़कर मिनरल का प्रोडक्शन 40 हजार करोड़ का है। इम्पोर्ट 4 लाख करोड़ का है। इसमें पेट्रोलियम और गैस शामिल नही है। सेंड, लाइमस्टोन जैसे मिनरल इम्पोर्ट हो रहे हैं। हमारा रुपया जितना बाहर जाएगा, कमजोर होगा। जो हमारे यहां है, उसे क्यों इम्पोर्ट किया जाए। माइनिंग को देश की इकोनॉमी में महत्वपूर्ण रोल निभाना है। राजस्थान में कंज्यूमर के बारे में सोचा है, सराहनीय है। सेंड माइनर मिनरल में उपलब्ध है। पॉलिसी ऐसी बनाई जाए कि चोरी कम से कम हो। आज भी राजस्थान में 300 से 400 ट्रक प्रतिदिन सेंड चोरी छिपे पड़ोसी राज्यों में जा रही है। राजस्थान में आंकड़ों के मुताबिक पिचके वर्ष 5 करोड़ टन की माइनिंग पर 236 करोड़ जबकि तेलंगाना में 1.3 करोड़ टन पर 434 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ है। अवैधानिक रूप से सेंड माइनिंग हो रही है। 57 मिलियन टन पर 37 मिलियन टन सीमेंट कंज्यूम हो रहा है। यूपी में 47.7 टन सेंड पर 10.1 मिलियन सीमेंट कंज्यूम हो रही है। आंध्रप्रदेश में सेंड माइनिंग फ्री कर दी गयी है। विभाग जगह का पता करेगा, क्लियरेंस खुद लेता है और स्वयंसेवी समूह को अलॉट किया। वहां उसको कहा कि फिक्स रेट पर सेंड माइनिंग करो। अच्छे तरीके से वहां काम चल रहा है। बहुत ही उचित दर पर वहां रेत उपलब्ध है। तेलंगाना में बिना किसी कॉस्ट के लोकल ग्रुप्स को अलॉट कर देते हैं खनन के लिए। छत्तीसगढ़ में सब पंचायतों को अलॉट कर खनन करवाया जा रहा है। मध्यप्रदेश में भी ऐसा ही है।
एम सेंड बहुत अच्छे तरीके से कंस्ट्रक्शन में काम कर रही है। कर्नाटक में 20 मिलयन टन प्रतिवर्ष उत्पादन हो रहा है। वेट, जीएसटी में यहां एग्जेम्प्शन दे रखा है। लीज छोटी ही ताकि क्लियरेंस लोकल या स्टेट लेवल पर ही मिल जाये। ट्रकों पर जीपीएस लगा रखा है ताकि पता चलता रहे। तकनीकी का सदुपयोग करें। चेक नाके लगाकर बार बार आप जांच नही कर सकते।
विशिष्ट अतिथि कुलपति प्रो. उमा शंकर शर्मा ने कहा कि हर तरह के निर्माण में रेती की अपनी महत्ता है। नदियों के पानी के बहाव के साथ कंकर, पत्थर आदि आते हैं जिससे रेती का निर्माण होता है। समय के साथ रेती का दोहन अधिक होने लगा इसलिए सुप्रीम कोर्ट को भी इस पर रोक लगानी पड़ी। आज रेती के विकल्प की बहुत जरूरत है। एम सेंड का उपयोग बढ़ाया जाए।
मुख्य वक्ता हिंदुस्तान जिंक के सीईओ सुनील दुग्गल ने कहा कि आज का ज्वलन्त विषय है जिस पर चर्चा जरूरी है। माइनिंग के साथ एग्रीगेट भी जोड़ना चाहिए। 35 वर्ष पहले जब मैंने काम शुरू किया तब पश्चिम देशों में मैन्युफेक्चरिंग सेंड का ही यूज करते थे। बात क्वालिटी की भी आती है। पहले इतनी अवेयरनेस नही थी लेकिन अब क्वालिटी को लेकर बहुत जागरूक हैं। इस कार्यशाला को कर्टेन रेजर के रूप में मानकर एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनीज को बुलाकर उनके साथ चर्चा करनी चाहिए कि वे कैसे काम करते हैं। बहुत बड़ा विषय है जिस पर तुरंत एक्शन लेने की जरूरत है। इस सेमिनार के फ्रुटफुल रिजल्ट्स निकलेंगे और एक्शनबल होंगे।
खान एवं भू विज्ञान विभाग के निदेशक डीएस मारू ने कहा कि रेत कहने को बहुत छोटा शब्द है लेकिन काम पड़ जाए तब बहुत बड़ा दिखता है। राजस्थान में निर्माण, कुछ राज्यों में अंडरग्राउंड माइनिंग में काम आता है। बीकानेर में बरसों से नदियों से रेती की लीज दी गयी थी। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि रॉयल्टी कांट्रेक्ट सिस्टम में तर्क कहीं भी जाता है और खोद ले आता है। राज्य सरकार ने लीज सिस्टम शुरू किया। पहले फ्री थी फिर लीज का पैसा लगने लगा। कलेक्टर को मूल्य निर्धारण के अधिकार दिए गए। सरकार का इस पर अभी भी कोई नियंत्रण नही है। नदियों के आसपास गावों की अपनी शिकायत है। इसीलिए इस मैन्युफेक्चरिंग सेंड की जरूरत पड़ी। समस्या से निजात पाना ही होगा। पहले 5 हेक्टर और अब इससे कम वाली लीज को भी परमिशन की जरूरत होती है।
माइनिंग इंजीनियर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अरुण कोठारी ने कहा कि पॉलिसी मेकर्स भी जुड़े हैं। एक मंच वरदान करने वाली यह संस्था है। प्रतिवर्ष 100 से अधिक कार्यक्रम आयोजित करती है। 5500 व्यक्तिगत सदस्य हैं, 7 स्टूडेंट चेप्टर इसके सदस्य हैं। एसोसिएशन की मिनरल को लेकर अनुशंसाएं सरकार शामिल करती हैं। राजस्थान में एक हजार किमी लंबी नदियां हैं। प्रतिवर्ष 50 से 70 मिलयन टन बजरी उत्पादन होता है। दक्षिण के राज्यों में 20 से 30 प्रतिशत तक एम सेंड इटपड़ित होती है।
सबसे पहले राज्य सरकार आगे आये, जहां मलबा उपलब्ध हो, वांछित व्यक्ति को जरूरी स्वीकृति उपलब्ध कराए और एम सेंड का इस्तेमाल करने के लिए नियम कायदे बनाने पर बल दे।
स्वागत उदबोधन में उदयपुर चेप्टर अध्यक्ष और डीन सीटीएई डाॅ. एस.एस. राठौड़ ने कहा कि खनन संबंधी समस्याओं के लिए संगठन काम करता है। बजरी की समस्या को देखते हुए मैन्युफैक्चरिंग सेंड की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ। 10 से 15 गुना बिल्डिंग मटेरियल महंगा हुआ है। राज्य में बारिश के दौरान कुछ सेंड जनरेट होती है बाकी नदियां खाली ही रहती है। पर्यावरण क्लीयरेंस की कंडीशंस को लेकर दी जाती है लेकिन सभी कुछ न कुछ गड़बड़ करते हैं। कई बार क्लीयरेंस विड्रॉ की जाती है। सेंड आप उतनी ही निकाल सकते हैं जितनी वहां बनती है लेकिन कितनी बनती है, उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। राज्य में 75 प्रतिशत मैन्युफेक्चरिंग सेंड की जा सकती है। एनवायरमेंट क्लियरेंस सिर्फ 25 प्रतिशत के लोए होती है लेकिन लोग 80 प्रतिशत तक उपयोग करते हैं। आयोजन सचिव सी.के. जैन ने आभार व्यक्त किया अतिथियों का बुके भेंटकर स्वागत किया गया।
तकनीकी सत्र-बजरी खनन से उत्पन्न समस्याओं पर पहले सत्र में अक्षय माथुर ने रेती खनन की लीजिंग पॉलिसी पर, मधुसूदन पालीवाल ने सेलियेन्ट फीचर्स ऑफ सेंड माइनिंग फ्रेमवर्क पर पत्रवाचन किया कि अवैध खनन पर नियंत्रण हो, खनन कार्य टिकाऊ हो और पर्यावरण के अनुकूल हो। उपलब्ध प्रौद्योगिकी का तकनीकी के आधार पर उपयोग कर बजरी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। श्री चांद चांदना ने आज की आवश्यकता नदी की बजरी के विकल्प पर विचार व्यक्त किये। डॉ आर चैधरी ने नदी के पेटे से बजरी की खनन समस्याएं, निर्माण यद्योग द्वारा महसूस समस्याएं, कन्फ्लिक्टस एंड रिजॉल्यूशन्स पर विचार व्यक्त किये। मेरिन मोय चक्रवर्ती ने खनन के वेस्ट का निर्माण में उपयोग पर पत्रवाचन किया। इस सत्र की अध्यक्षता खान विभाग के अतिरिक्त निदेशक एन.के.कोठारी ने की। सह अध्यक्षता सी नरसिमुलु ने की। दूसरे सत्र की अध्यक्षता डॉ आर चैधरी ने की। सह अध्यक्षता आरपी गुप्ता ने की। आसिफ एम अंसारी और नितिन छाजेड़ ने मैन्युफैक्चर्ड बजरी की राजस्थान के संदर्भ में उपयोगिता पर पत्रवाचन किया। जीवी देवी कुमार ने कोयला खनन के ओवर बर्डन से नदी बजरी का विकल्प पर, किशोर बोटाडरा ने रेती समस्या कोई समस्या नही विषय पर पत्रवाचन किया।
प्रवीण शर्मा ने अपनी पूजोलोना कंपनी की बनाई गई मशीन रेती उत्पादन की मशीन पर प्रजेंटेशन दिया। प्रोपेल इंडस्ट्री और मेवाड़ हाईटेक कंपनी ने बजरी बनाने वाली क्रशिंग मशीन की उपयोगिता समझाई।

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