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प्राचीन दर्शन और आधुनिक विज्ञान को प्रतिस्पर्धी दावों के रूप में नहीं देख सकते : जाह्नवी कुमारी

BY — August 22, 2026

उदयपुर। इतिहास विभाग, फैकल्टी ऑफ़ सोशल साइंस एन्ड हुमननिटिज, पाहेर विश्वविद्यालय, ग्लोबल संस्कृत फोरम और ग्लोबल हिस्ट्री फोरम के तत्त्ववधान मेँ आयोजित अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय प्राचीन ज्ञान परम्परा, ज्ञान और विज्ञान के आधुनिक आयाम विषय के उद्घाटन पर पारंपरिक विरासत और समकालीन जिज्ञासा के बीच तालमेल के बारे में बोलते हुए,मुख्य अतिथि मेवाड़ घराने की जाह्नवी कुमारी मेवाड़ ने स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक वैज्ञानिक सोच पर एक विचारोत्तेजक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
जाह्नवी ने इस बात पर जोर दिया कि प्राचीन दर्शन और आधुनिक विज्ञान से जुड़ी बातचीत को प्रतिस्पर्धी दावों या प्रमाणिकता के मामले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मुख्य वक्ता अग्रणी विद्वान ऑस्ट्रेलिया की रेबेका टेलर्स गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक ने प्रभावशाली ढंग से मूर्तिकला की उस गहरी कलात्मक महारत को एक ऐसी सार्वभौमिक भाषा के रूप में समझाया जो सीमाओं से परे है। प्राचीन भारतीय ज्ञान-प्रणालियों की स्थायी संरचना पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने दिखाया कि कैसे ज्ञान की ये बुनियादी प्रणालियाँ आज भी आधुनिक अकादमिक खोज को दिशा देती हैं और सदियों पुरानी पूर्वजों की विरासत को आधुनिक वैश्विक विद्वता की ज़रूरतों से सहजता से जोड़ती हैं।

विशिष्ट अतिथि बनस्थली विद्यापीठ के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर अंशुमान शास्त्री ने एक स्थायी भविष्य सुनिश्चित करने में पारंपरिक ज्ञान के महत्व पर ज़ोर दिया।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि एआई सिस्टम को ज्यादा मानवीय बनाने और आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस व आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस की दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमारे प्राचीन ज्ञान की जड़ों का सहारा लेना ज़रूरी है।
विशिष्ट अतिथि एवं पाहेर ग्रुप अध्यक्ष प्रो बी. पी. शर्मा ज़ी ने बताया की भारतीय प्राचीन ज्ञान परम्परा एक अत्यंत व्यावहारिक, वैज्ञानिक और जीवन रक्षक मार्गदर्शक के रूप में उभरी है। प्राचीन काल में नालंदा और तक्षशिला जैसे केंद्रों से जो ज्ञान पूरे देश-विदेश में फैला था, वह आज की मानसिक, पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याओं का सटीक समाधान प्रस्तुत करता है। विशिष्ट अतिथि संस्कृति मंत्रालय के प्रो राजेश कुमार मिश्र थे।
अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो हेमंत कोठारी ने सभी इतिहासकारों व सामाजिक वैज्ञानिकों से एआई को अपनाने का आग्रह किया, क्योंकि एआई का इतिहास और हमारा सामूहिक प्राचीन ज्ञान ही विज्ञान और वैज्ञानिक प्रगति के भविष्य की नींव रखने जा रहे हैं।
आयोजन सचिव डॉ अजात शत्रु सिंह शिवरती ने बताया कि 222 शोधर्थियों ने रजिस्ट्रेशन कराया गया, जिसमे आज 148 शोधार्थियों ने आज पेपर प्रेजेंट किया। इस संगोष्ठी में प्रो दिलबाग सिंह (वरिष्ठ इतिहासकार), प्रो महेश दीक्षित (कुलपति,कल्ला ज़ी वैदिक विश्वविद्यालय, निबहेड़ा), डॉ अहमद(सूडान ), टोरे गुलब्रांडसेन (नोर्वे), डॉ बेईमा (अफ्रीका) प्रो अखिलेश (इंदौर) , डॉ महेन्द्र सिंह तंवर(निदेशक,महाराजा मान सिंह पुस्तक शोध केंद्र मेहरानगढ़ ), प्रो नीरज शर्मा, अधिष्ठाता, फैकल्टी ऑफ़ सोशल साइंस एंड हयूमेनिटीज़, प्रो नीलम कौशिक आदि इतिहासकार, शोधार्थी, शिक्षाविद सम्मलित हुए।

admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.