संस्कृति का दर्पण है बागोर की हवेली का संग्रहालय

BY — May 7, 2012

उदयपुर। उदयपुर की पिछोला झील के किनारे गणगौर घाट पर स्थित बागोर की हवेली में स्थित संग्रहालय रियासतकालीन संस्कृति का एक दर्पण है। रजवाडों के रहन-सहन, वेशभूषा, आमोद-प्रमोद, तीज-त्यौहार आदि सांस्कृतिक विरासत को संजोये है यह संग्रहालय। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा संचालित इस संग्रहालय को देखने के लिए बडी संख्या में विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं और यहां के शासकों के समय की संस्कृति का साक्षात्कार कर अचम्भित और अभिभूत होते हैं।

खूबसूरत जाली-झरोखे और स्थापत्य कला से पूर्ण यह हवेली देखकर ही पर्यटक रोमांचित हो जाते हैं और जब वे हवेली के 18 कमरों में संग्रहालय के रूप में सुरक्षित रखी गई संस्कृति को देखते हैं तो एक अलग ही प्रकार की अनुभूति होती है।
संग्रहालय में मेवाड़ के राजघराने के समय उपयोग में लायी जाने वाली वेशभूषा, आभूषण, प्रसाधन सामग्री, विभिन्न प्रकार की पगडि़यां, कलात्मक चौपडे़, बाजोट, तोरण, पाटिया, रसोई के काम में आने वाले बर्तन, भजन कीर्तन के वाद्ययंत्रों आदि को यहां प्रदर्शित किया गया है। तत्कालीन हस्तशिल्प, बुनाई, छपाई, कारीगरी आदि का प्रदर्शन भी किया गया है। बडे कांच , दर्पण, मदिरा की सुराइयां, प्याले आदि संग्रहित किये गये हैं। यहां पर चित्रमय सांप-सीढी, जिसमें 72 खंड है तथा दिगपाल, चन्द्रलोक, तपलोक आदि दर्शाये गये हैं, दर्शनीय हैं।
राजा और रानियों के बैठक कक्ष और उनकी दीवारों पर कलात्मक भित्तिचित्रों का अलंकरण देखते ही बनता है। साथ ही गणगौर की सवारी, पशु-पक्षियों के चित्र, युद्घ के दृश्य, दिवाली, होली, फूलडोल का मेला, हरियाली अमावस्या का मेला, पडीनाथ का मेला आदि के चित्रों के साथ-साथ मांगलिक प्रसंगों को भी चित्रों में उकेरा गया है।
संग्रहालय में विभिन्न वेशभूषा धारण किये महिलाओं के मॉडल, करीब 300 से अधिक पगडि़यां और विशेष उल्लेखनीय 500 से अधिक कलात्मक एवं सजावटी कठपुतलियां देखते ही बनती है। इस संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की कठपुतलियों का जितना अच्छा संग्रह किया गया है संभवत: ही कहीं और देखने को मिले। कठपुतलियों के इस संग्रह में वर्ष 2009 में शिल्पग्राम में आयोजित कठपुतली कार्यशाला में विशेषज्ञों के निर्देशन में कठपुतली बनाने वाले कारीगरों द्वारा बनायी गई कठपुतलियों को भी यहां प्रदर्शित भी किया गया है। इस संग्रहालय को कठपुतलियों का संसार भी कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
महलों की आन्तरिक दीवारों पर बनायी गई प्राकृतिक परिवेश में रंग-बिरंगे कांच के नृत्य मयूरों की आकृतियां, दीवारों पर कांच की कारीगरी का कार्य, पिछोला झील की तरफ रंग-बिरंगे कॉच के झरोखे, कलात्मक मेहराब आदि भी संग्रहालय देखने आने वालों के लिए आकर्षण का प्रबल केन्द्र है।
यह संग्रहालय निश्चित ही रियासतकालीन संस्कृति और सामाजिक जीवन का अहसास कराता है। इस हवेली में संग्रहालय की स्थापना दिसम्बर 1997 में की गई। यहां राजस्थान की संस्कृति को गुजरात, महाराष्ट्र व गोवा दमन दीव तथा दादर नागर हवेली से जोडते हुए सांस्कृतिक संरक्षण व प्रचार-प्रसार के लिए पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का कार्यालय भी संचालित है। इसके द्वारा समय समय पर विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए कलाकारों के पंजीकृत दलों द्वारा कार्यक्रम आयोजित कराये जाते हैं। संग्रहालय में प्रतिदिन सायंकाल सेलानियों के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।
संग्रहालय विकास
बागोर हवेली के इस अनूठे सांस्कृतिक संग्रहालय में संग्रहित वस्तुओं को और अधिक प्रभावी रूप से प्रदर्शित करने तथा संग्रहालय को आकर्षक बनाने के लिए भारत सरकार की संग्रहालय विकास योजना के अन्तर्गत 80 लाख रुपये प्राप्त हुए है। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक मोहम्मद फुरकान खान के मुताबिक पिछले करीब एक वर्ष से इस राशि से संग्रहालय का जीर्णोद्घार एवं दीर्घाओं को आकर्षक बनाने आदि के कार्य किये जा रहे हैं।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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