पत्थर व चित्रों की नहीं, उसमें निहित भगवान की पूजा करें

BY — January 13, 2013

130118Udaipur. स्वामी विवेकानंद को उनका यह नाम और उनके द्वारा पहनी गई पगड़ी राजस्थान के अलवर जिले खेतड़ी शहर के राजा अजीतसिंह ने प्रदान किया था। स्वामी विवेकानंद के 39 वर्ष के जीवन में ऐसी अनेक घटनाएं घटित हुई जिन्होनें उनका ही बदल दिया। उनके जीवन में घटित एक घटना के पश्चात उन्होनें कहा कि पत्थर या चित्र की पूजा नहीं वरन् उसमें निहित भगवान की पूजा की जानी चाहिए और यही बात उन्होनें अपनाई भी।

स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयंती पर महाराणा प्रताप वरिष्ठ नागरिक कल्याण संस्थान द्वारा अशोकनगर स्थित विज्ञान समिति में आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए माहराणा प्रताप गौरव केन्द्र के ओमप्रकाश ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विवेकानंद का प्रारम्भिक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। बचपन में ही उनके पिता का देहान्त हो जाने के कारण पारिवारीक स्थिति काफी खराब हो गई थी और उनके घर में दो जून की रोटी के भी लाले पड़ गये थे। स्वामी विवेकानंद का जीवन काफी मुश्किलों में बीता लेकिन उनमें निहित प्रतिभा की झलक 5 वर्ष की आयु से ही मिलनी प्रारम्भ हो गई थी।
130119उन्होनें बताया कि स्वामी विवेकानंद में अपने जीवन में सिर्फ भगवान को पाने की चाही थी औश्र इसी चाह ने उन्हें स्वामी रामकृष्ण परमंहस जैसे विद्वान गुरू के पास पहुंचा दिया। स्वामी ने रोजगारपरक शिक्षा के बजाय ज्ञान रूपी शिक्षा को अधिक तवज्जो दी थी। गुरू-शिष्य के बीच का संबंध बहुत प्रगाढ़ था। जीवन यापन के लिए वे जीवन में अनेक स्थानों पर गये लेकिन उन्हें रोजगार नही मिला और अतत: वे तीन दिन तक लगातार भूखे रहने के कारण अगले दिन में चलते-चलते गिर गये थे। गुरू रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीते जी स्वामी विवेकानंद को कभी सन्यसी नहीं बनने दिया। 15 अगस्त 1886 में परमहंस ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपनी सभी सिद्धियां स्वामी को सौंप दी।
विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित धर्मसभा में 14 बार भाषण दिया था और हर भाषण पर उन्हें तालियों की खूब दाद मिली। श्किागो से वे लंदन पहुंचे थे और लंदन में उनकी एक अंग्रेज महिला शिष्या बनी जो बाद में भारत आकर भगिनी निवेदिता बनी। उसने अपना शेष जीवन भारत में ही बिताया और उसने कहा था कि मेरी मृत्यु के पश्चात मुझे दफनाया न जाए वरन जलाकर उसकी राख को हिमालय के पर्वतों व नदियों में बहा दी जाए। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि एकाग्रता, ध्यान,परिचर्या से ही स्मरणशक्ति प्राप्त की जा सकती है। इससे पूर्व संस्थान के महासचिव भंवर सेठ ने स्वामी विवेकानंद के जीवन पर प्रकाश डालते हुए सभी अतिथियों का स्वगात किया। इस अवसर पर भाजपा नेता हीरालाल कटारिया, एडवोकेट फतहलाल नागौरी, सोहनलाल कोठारी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। प्रारम्भ में प्रेम प्यारी भटनागर ने ईश वंदना प्रस्तुत की बजकि अंत में चौसरलाल कच्छारा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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