‘खूंटे से बंधे रहे तो पशु हो जाएंगे’

BY — January 27, 2013

chintanमनुष्य होने का मायना है वर्तमान में जिस अवस्था और धरातल पर हैं वहाँ से ऊर्ध्वमुखी स्थान की ओर आगे बढ़ते हुए शीर्षस्थ स्थान, शिखर अथवा चरम लक्ष्य की प्राप्ति।

इसके लिए पूरे जीवन भर व्यक्ति को उन पड़ावों, आश्रयों और आश्रमों के दौर से गुजरना पड़ता है जो उम्र के साथ बदलते रहते हैं अथवा इनके हिसाब से आदमी को ढलना और बदलना पड़ता है। जीवन में विकास और निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए जरूरी है कि जीवन भर से जड़ता समाप्त हो। जड़ता वहीं होती है जहाँ अनचाही स्थिरता आ जाती है। जहाँ परिवर्तन का प्रवाह नहीं हुआ करता वहीं जड़त्व और मूकत्व आ जाते हैं और यह जड़ता पशुत्व के आभामण्डल में प्रवेश करने का स्पष्ट संकेत होती है।
जीवन में नवनिर्माण और अनवरत प्रवाह के लिए जितना अपने आपको जानना जरूरी है उतना ही जरूरी है जमाने को समझना। इसके लिए व्यक्ति को जिज्ञासाओं के शमन के हर अवसर का भरपूर उपयोग करना चाहिए और उस स्थिति में आने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए जहाँ जिज्ञासाओं का लेश मात्र भी अस्तित्व न रहे।
यही वह अवस्था होती है जहाँ ज्ञान की पवित्रता का पूर्ण अहसास किया जा सकता है। इसी अवस्था के प्राप्त होने के बाद हृदयाकाश से अंधेरा गायब हो जाता है और यह प्रकाश से भर उठता है। यही प्रकाश सभी प्रकार के संशयों को दूर कर देता है। और जिस समय व्यक्ति के सारे संशयों का निराकरण हो जाता है वह चक्रों के जागरण की भाव भूमि प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक श्रेष्ठ और उत्तम गुणी तथा जीवन लक्ष्यों की प्राप्ति के प्रति सजग व्यक्ति के लिए यही अभीप्सित होता है। जो इसे पा लेता है उसका आनंद सांसारिक आनंदों से कई गुना अधिक महा-आनंद का अनुभव कर लेता है और यह आनंद ऐसा होता है जो कि कुछ क्षण या दो-चार दिन नहीं रहकर हमेशा उसी चरम अनुपात में बना रहता है जहाँ लौकिक और पारलौकिक आनंद के सारे स्वरूप रह रहकर साकार होते रहते हैं।
व्यक्ति को जीवन में प्रत्येक क्षण परिवर्तन के लिए अपने आपको मानसिक तौर पर तैयार रखना चाहिए तभी उसे जीवन के सत्य और प्रगतिशील होने का अहसास हो सकता है। कई बार हम थोड़े-बहुत किन्तु क्षणिक सुकून और आनंद की प्राप्ति के लिए जीवन के बीच किसी एक पड़ाव पर तनिक विश्राम करने रुक जाया करते हैं और इसे ही मंजिल समझ लिया करते हैं। बस यहीं से अपनी जड़ता की शुरूआत हो जाती है। यह पड़ाव मुद्राओं का बाजार हो सकता है, कुबेर का कोई खजाना, रूप-सौन्दर्य का कोई मूर्तमान स्वरूप हो सकता है या हमें किसी न किसी तरह भरमा कर अपने पास बनाए रखने वाले बाजीगर। ये पुरुष भी हो सकते हैं और स्त्री भी, बीच वाले भी हो सकते हैं या वो लोग भी हो सकते हैं जो दोनों में नहीं गिने जाते। बिना घर के भी हो सकते हैं, और बगैर घाट वाले भी। पूरी दुनिया ऐसे अनगिनत पड़ावों से भरी है जहाँ हम थोड़ा सा सुकून पाकर जीवन लक्ष्य को कुछ देर के लिए भुला बैठते हैं।
यही वह संक्रमण काल होता है जो हमारी दिशाओं और दशाओं को अनिर्णय एवं जड़ता भरे मकड़जालों के हवाले करने लगता है। एक बार हम लक्ष्य या चरम आनंद को थोड़ा भी भुल जाया करते हैं तभी से प्रमाद हमारे मन-मस्तिष्क और शरीर में अपनी जगह बना लेता है। फिर चाहे जब किसी न किसी डेरे या आदमी के प्रभाव में आकर रुकने का क्रमिक दौर अपना मन स्वीकार कर लेता है। यही वे क्षण होते हैं जो हमें मनुष्य की ऊर्ध्वगामी यात्राओं की बजाय अधोगामी व्यक्तित्व की ओर इशारा करने लग जाते हैं और हम जड़त्व प्राप्त कर स्थिरता या ठहराव को अपनाने लगते हैं।
दुनिया भर के संसाधन, रूप-सौन्दर्य और दैहिक सुकून की प्राप्ति का मोह कह लें या परिवेश की सुन्दरता…. ये सब हमें एक जगह बाँधे रखने में कोई कसर बाकी नहीं रखते और हम कभी सायास तो कभी अनायास मोहपाश में बंधते रहते।

डॉ. दीपक आचार्य

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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