इंसानियत अपनाएं अन्यथा बहा ले जाएंगी नदियां

BY — June 30, 2013

chintanइतना विराट महाप्रलय…. लाशों का अंबार….भूख और प्यास के मारे दम तोड़ती जिन्दगियाँ….नदियों का रौद्र रूप….कहीं वीरानी, सन्नाटा और कहीं चीख-चीत्कार….घोड़ों और खच्चरों की मौत…बस्तियां बह गई और आदमी बेघर हो गए, उजड़ गए परिवार, कुटुम्बी खो गए और भगवान भोलेनाथ केदार रह गए अकेले… जैसे पहले थे और रहे हैं।

इस महाप्रलय ने जितना इंसानियत को शर्मसार नहीं किया उतना बाद की घटनाओं और मंजरों ने किया है। सब कुछ भूल-भुलाकर हमारा ध्यान राहत और बचाव की ओर होना चाहिए था लेकिन सिर्फ और सिर्फ सेना के जवानों को छोड़ दिया जाए तो हम सब चुपचाप देखने और घड़ियाली आँसू बहाने के सिवा आखिर क्या कुछ कर पाए हैं।
दावों, बयानों और पब्लिसिटी के स्टंट अपनाने से विपदाग्रस्त लोगों की न तो भूख मिट सकती है और न ही प्यास। जिन लोगों ने मौत को गले लगा लिया, जिन्होंने मौत को बहुत करीब से देखा है और जिन लोगों ने लाशों के साथ दिन-रात बिताये हैं उन लोगों से पूछें कि उन्हें जिन लोगों से उम्मीद थी उन्होंने आखिर क्या कुछ किया।
हम सभी में लाशों के समंदर के बीच श्रेय लेने की होड़ ने मानवीय मूल्यों और इंसानियत के सारे आदर्शों की हवा निकाल कर रख दी है। दुनिया में आने वाली सारी आपदाओं का मूल कारण दैवीय होता है और दैवीय आपदा तभी आती है जब इंसान प्रकृति को रौंदने, उस पर अधिकार करने और शोषण करने पर आमादा हो जाता है।
हमने स्वर्ग से उतरी गंगा के लिए धरती पर कितना अन्याय किया है, यह सब किसी से छिपा हुआ नहीं है। नदियों को हमने माँ की तरह पूजा है और ये नदियां ही हैं जिनके किनारे-किनारे संस्कृतियों और सभ्यताओं का क्रमिक विकास हुआ है। नदियां ही हैं जिनके सहारे इंसान पशुत्व से आगे बढ़कर आज इंसान के रूप में अपनी प्रतिष्ठा कायम कर सका है। पर मानवी संस्कृति और सभ्यता को पालने वाली नदियों को हम कितना सम्मान दे पाए हैं, उनकी अस्मिता का कितना ख्याल रख पाए हैं, इस पर जरा सा भी चिंतन कर लें तो प्रकृति की सारी आपदाओं का रहस्य अपने आप समझ में आ जाएगा।
नदियों के रास्तों पर हमने बस्तियां बसा ली, अतिक्रमण कर लिया और होटलें, धर्मशालाएं, मन्दिर और व्यवसायिक केन्द्र बना लिए जहाँ हमने दैव भूमि की सारी मर्यादाओं को भुला कर इस भूमि को भोग-विलास का केन्द्र बना लिया और यात्राओं के मर्म पर उन्मुक्त और स्वच्छन्द आनंद हावी होने लगा था।
ऎसे में हमने परंपरागत मौलिक प्रवाह और पुण्य की परिपाटियोें को जिस कदर ध्वस्त करने में अपनी शक्ति लगा दी थी उसी का जवाब उत्तराखण्ड की वादियों ने दे दिया है। ये चेतावनी है केदार की, मां गंगा की, गंगोत्री-यमुनोत्री की और भगवान बदरी विशाल की। अब भी चेत जाएं वरना पहाड़ उतर आएंगे जमीन पर और नदियाँ सब कुछ बहा ले जाएंगी। किसी को भ्रम या भुलावे में नहीं रहना चाहिए।

– डॉ. दीपक आचार्य

Print Friendly, PDF & Email
admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *