जैनेटिक परामर्श से कम हो सकता है स्कीजोफ्रीनिया

BY — September 7, 2013

विषय विशेषज्ञों ने दिए व्याख्यान
राजस्थान चैप्टर ऑफ द इंडियन साइकाइट्रिक सोसायटी का वार्षिक सम्मेलन

070916Udaipur. ‘स्कीजोफ्रीनिया’ माता-पिता से बच्चों  में आता है। सामान्य रूप से 40 प्रतिशत तथा जुड़वा बच्चों में 80 प्रतिशत तक इस रोग के होने की संभावना रहती है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के विचार सामान्य से हटकर हो जाते है और अन्य लोगों को अपना विरोधी समझने लग जाता है। हालांकि अभी तक इस रोग के जीन्स की पहचान नहीं हो पाई है परन्तु इस रोग की संभावनाओं को जैनेटिक परामर्श से कम किया जा सकता है।

यह जानकारी दिल्ली से की प्रो. डॉ. स्मिता देशपाण्डे ने दी। वे यहां गीतांजलि मेडिकल कॉलेज के ऑडिटोरियम में द इंडियन साइकाइट्रिक सोसायटी के राज्यश चैप्टभर की ओर से आयोजित दो दिवसीय 28 वें वार्षिक सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं।
त्रिशूर (केरल) के डॉ. ई. मोहनदास ने मानव में डिप्रेशन के जेनेटिक विषय पर बताया कि अभी तक भारत में इस रोग पर पूर्णरूप से शोध नहीं हो पाया है। विकसित देशों के शोध के आधार पर हम इस पर प्रयासरत हैं।
चंडीगढ के डॉ. अजित अवस्थी ने एग्जाइमा रोग में जीन्स पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि यह एक प्रकार का डिमेशिया सन्निपात का रोग है जो अधिक आयु वर्ग के लोगों में ज्यादा पाया जाता है। वृद्घावस्था में स्मरण शक्ति का कम होना इस रोग के लक्षण है।
जयपुर से आए डॉ. शिव गौतम ने नशीले पदार्थ व उनके प्रयोगकर्ता पर जींस पर होने वाले प्रभावों पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि इस जींस का प्रभाव नशा करने वाले परिवारों में अधिक पाया जाता है। उन्होंने कहा कि आजकल नाइट पार्टियों में क्लब ड्रग्स का बहुतायत मात्रा में उपयोग किया जा रहा है जिसका सीधा असर हमारे मस्तिष्क पर पड़ता है। जो हमारे मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर देता है। जो हमारे आने वाली पीढी़ के लिए हानिकारक है।
सेमीनार में विषय विशेषज्ञों ने अपने व्याख्यान द्वारा मानसिक समस्याओं के आनुवांशिक एवं कौशिका आधारित एवं शरीर के कार्य प्रणाली में आए विकारों को मानसिक व्याधियों से जोड़कर समझाया गया। अभी तक मानसिक रोगों के कारणों में केवल वातावरण एवं शरीर की सामान्य व्याधियों को ही कारण समझा जाता था। सेमीनार द्वारा नवीन शोध के उपरांत मानसिक रोग के कारणों को बेहतर रूप से समझकर उपचार के तरीकों का विकास संभव होगा। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन में 150 से अधिक मनो चिकित्सक हिस्सा ले रहे हैं।
पत्रवाचन के पश्चात मनोरोगों से जुडे़ शोध पत्रों पर राजस्थान मनोरोग सोसायटी के सदस्य द्वारा शोध पत्रों का वाचन किया गया। विजेताओं को अतिथियों द्वारा पारितोषिक प्रदान किए गए। सोसायटी द्वारा डाक्टरों को उनके अकादमीक उपलब्धि के लिए अवार्ड भी दिए गए। इसके पश्चात शाम को सोसायटी की साधारण सभा की बैठक हुई। धन्यवाद की रस्म कार्यक्रम सचिव डॉ. जितेन्द्र जीनगर ने अदा की।
इससे पूर्व गीतांजलि विश्वविद्यालय के चेयरमैन जे. पी. अग्रवाल ने सरस्वती वंदना व दीप प्रज्ज्वलन कर किया। विशिष्ट अतिथि वाइस चांसलर डॉ. डॉ. आर. के. नाहर, कुलपति डॉ. खदीजा ए. सैफी थे। कार्यक्रम में स्वागत उदबोधन गीतांजलि मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. डी. एम. माथुर ने  दिया। कार्यक्रम में सोसायटी के चैयरमेन डॉ. संजय गहलोत, अध्यक्ष डॉ. के.के. वर्मा, सोसायटी के सचिव डॉ. एल.सी. ढाका ने वार्षिक रिपोर्ट पेश की। पिछले वर्ष जैसलमेर में मनोचिकित्सा के क्षेत्र में सवोत्तम पत्रवाचन के लिए डॉ. पंकज कुमार मित्तल को गहलोत अवार्ड, डॉ. अखिलेश जैन को कोटा अवार्ड व डॉ. अनंत कुमार राठे को सोलंकी अवार्ड से सम्मानित किया गया।

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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