बिना चोट के मूर्ति और गुरू की बिना शैक्षिक चोट के शिष्य महान नहीं बनताः शिवमुनि

BY — August 6, 2018

उदयपुर। श्रमणसंघीय आचार्य शिवमुनि महाराज ने कहा कि जीवन में जिस प्रकार पत्थर पर शिल्पकार की चोट पड़े बिना वह पत्थर मूर्ति नहीं बन सकता ठीक उसी प्रकार गुरू की शैक्षिक चोट को सहन किये बगैर शिष्य महान नहीं बन सकता है और यदि वह चोट सह जाओगें तो मूर्ति बन जाओगें और तुम्हारी भी पूजा होगी।

वे आज महाप्रज्ञ विहार स्थित शिवाचार्य समवसरण में श्रद्धालुओं को सम्बोधित कर रहे थे। डाॅ.शिवमुनि ने कहा कि हर गुरू यही चाहता है कि उसके शिष्य में परमात्मा प्रभु जैसा पुरूषार्थ, प्रभु जैसी मैत्री और करूणा जैसे भाव प्रकट हों। उन्होंने कहा कि व्यक्ति कितना ही पढ़ा लिखा हो, विद्वान हो, यदि उसमें विनय का गुण न हो तो उसकी समस्त विद्वता बेकार है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को बड़ा करना ही आपका कत्र्तव्य नहीं है। उनको धर्म के संस्कार देना भी आपका दायित्व है। धर्म में रूचि पैदा करों। आपकी रूचि जहां होगी वो कार्य आपको प्रिय लगेगा। धर्म से ज्यादा आपको अधर्म में ज्यादा रूचि है। माला फेरते हुए आपको नींद आ जाती है लेकिन रूपये गिनते हुए आपको कभी नींद नहीं आएगी। धर्म आपको सुख देता है, फिर भी उसको कल के ऊपर टाल देते है, अधर्म आपको दुःख देता है, फिर भी आप तुरंत करते है।
उन्होंने कहा कि आज मालव केसरी सौभाग्यमल म.सा. का पुण्य स्मृति दिवस है। उनका आभामंडल आकाश की भांति निर्मल था। उनकी मधुरवाणी हर किसी को अपनी और आकर्षित करती थी। श्रमण संघ की स्थापना में आपका विशेष योगदान रहा है। छोटी उम्र में ही माता-पिता का योग हुआ। आचार्य नन्दलाल म.सा.ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखते हुए मात्रा 13 वर्ष की उम्र में जिनशासन में दीक्षित कराया। श्रमण संघ के विकास और उत्थान में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
निर्मल व्यक्तित्व के धनी पूज्य भगवती मुनि जी म.सा. ‘निर्मल’ आज हमारंे बीच नहीं रहें। उनका जीवन सद्गुणों के अनेक गुलदस्तों से सजा हुआ था। मात्र 13 वर्ष की उम्र में उन्होनें दीक्षा लेकर अपना जीवन जिनशासन के लिए समर्पित किया। समस्त भारत भर में विहार यात्रा करके जैन धर्म की आपने प्रभावना की। 35 से अधिक पुस्तकों का आपने सृजन किया। आज हम उनको श्रद्धाजंलि अर्पित करते है।

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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