उदयपुर. शहर के जागरूक नागरिकों और झील हितैषियों ने बज़ट भाषण में झील विकास प्राधिकरण स्थापना की घोषणा के बावजूद झीलों का जल संसाधन विभाग से नगर परिषद को हस्तांतरण करने का निर्णय किसी साजिश का प्रतीक है. झील संरक्षण समिति के सहसचिव अनिल मेहता ने कहा कि झीलें केवल पानी का टेंक नहीं है। इनका अपना एक विशिष्ट इको सिस्टम होता है। जो जल ग्रहण क्षेत्र, प्रवाह क्षेत्र तथा डाउन स्ट्रीम से बनता है. विज्ञान व तकनीकी विशेषज्ञों, प्रयोगशालाओं, संसाधनों व समुचित अधिकार से सम्पन्न झील विकास प्राधिकरण का गठन ही झीलों का संरक्षण सुनिश्चित कर सकता है.
समिति सचिव डॉ. तेज राजदान ने कहा कि झीलें नगर परिषद को देने की कवायद झीलों को तबाह करने व प्राधिकरण बनाने की प्रक्रिया को ठण्डे बस्तें में डालने की साजिश प्रतीत हो रही है. झील प्राधिकरण की स्थापना के बजाय यह अवांछनीय निर्णय समझ से परे है. झील विकास प्राधिकरण की जब तक स्थापना न हो, तब तक झीलों का दायित्व संभागीय आयुक्त को सौपना उचित होगा।
डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के सचिव नन्दकिशोर शर्मा ने बताया कि झील का अपने आप में सम्पूर्ण तंत्र होता है जिसमें इसके जल अधिग्रहण क्षेत्र से लेकर बहाव क्षेत्र की सीमा आती है। जो नगर परिषद की सीमा नहीं है। उदयपुर की झीले मात्र पर्यटन नही वरन पेयजल स्त्रोत भी है.
चांदपोल नागरिक समिति के अध्यक्ष तेजशंकर पालीवाल ने कहा कि नगर परिषद सीवरेज, झीलों में गिरती कचरे व नालियो तथा वर्षा के दौरान आवासीय बस्तीयों में भरे पानी जैसी समस्याओं को भी ठीक से हल नहीं कर पा रही है। उन्हें झीलों की पूरी जिम्मेदारी देना आश्चर्यजनक है. छोटे तालाबों को अब तक नगर परिषद चिन्हित भी नहीं कर पायी है. झीलों का प्रबन्धन परिषद के बूते का नहीं है।
झील हितैषी नागरिक मंच के संस्थापक हाजी सरदार मोहम्मद ने कहा कि जल संसाधन विभाग को झीलों के दायित्व से मुक्त करना अपरिपक्व निर्णय है। झीलों के प्रबन्धन में तकनीकी विशेषज्ञता के बिना नगर परिषद को झीले सौपना आत्मघाती कदम होगा।
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