पीएमसीएच के चिकित्सकों ने जानलेवा संक्रमण को हराकर 40 वर्षीय मरीज को दी नई जिंदगी
उदयपुर। चिकित्सा जगत में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता (Antibiotic Resistance) आज एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। लेकिन, सही समय पर सटीक निदान (Diagnosis), आधुनिक तकनीक और आईसीयू टीम के अथक प्रयासों से मौत के मुंह से भी मरीज को वापस लाया जा सकता है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में जहाँ डॉ. चेतन गोयल और डॉ. सुनील कुमार की टीम ने एक 40 वर्षीय मरीज को एक बेहद दुर्लभ और खतरनाक संक्रमण से बचाकर नई जिंदगी दी। मरीज के सफल इलाज में डॉ.इब्राहिम एवं आईसीयू स्टॉफ का भी सहयोग रहा।

गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुँचा मरीज : दरअसल 40 वर्षीय मरीज लंबे समय से अनियंत्रित मधुमेह और टी.बी.की बीमारी से पीढ़ित था। मरीज को सांस लेने में गंभीर समस्या एवं गंभीर स्थिति में पीएमसीएच लाया गया, तब उनकी हालत बेहद नाजुक थी। पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, भीलों का बेदला के चेस्ट एवं टी.बी रोग विभाग के डॉ.सुनील कुमार ने मरीज की जाँच करने पर पाया गया कि मरीज गंभीर मेटाबॉलिक एसिडोसिस की समस्या से ग्रसित था। मरीज के रक्त में कीटोन्स की मात्रा बहुत अधिक थी और शरीर का पीएच स्तर गिरकर 7.01 पर पहुँच गया था, जो कि चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत घातक माना जाता है। सामान्यतः, इतना कम पीएच स्तर मरीज के जीवित बचने की संभावना को बहुत कम कर देता है। मरीज का उपचार किसी चुनौती से कम नहीं था। चिकित्सकों ने मरीज को बचाने के लिए ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स, वैसोप्रेसर (रक्तचाप बढ़ाने की दवा) और एनआईवी सपोर्ट दिया। साथ ही, शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त फ्लूइड रिससिटेशन किया गया। इन सब प्रयासों के बाद भी मरीज की श्वसन प्रणाली लगातार फेल होती जा रही थी। स्थिति बिगड़ते देख डॉक्टरों ने तत्काल निर्णय लेते हुए मरीज को इंटुबेट किया और वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा।
बायोफायर टेस्ट ने खोला बीमारी का राज : क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉ.चेतन गोयल ने बताया कि मरीज के फेफड़ों की गहराई से जाँच करने के लिए ब्रोंकोएल्वियोलर लैवेज प्रक्रिया अपनाई गई। एक डायग्नोस्टिक प्रक्रिया है, जिसमें फेफड़ों के अंदर नमकीन पानी डालकर वापस निकाला जाता है, ताकि वहाँ मौजूद संक्रमण, सूजन या कैंसर कोशिकाओं की जाँच की जा सके। और सैंपल को बायोफायर और कल्चर सेंसिटिविटी टेस्ट के लिए भेजा गया। बायोफायर जाँच में वीआरएसए नामक खतरनाक बैक्टीरिया की पुष्टि हुई। यह बैक्टीरिया टिकोप्लानिन और वैन्कोमाइसिन जैसी शक्तिशाली दवाओं के प्रति भी प्रतिरोधी हो चुका था। सामान्यतः इन दवाओं को संक्रमण के इलाज में आखिरी हथियार माना जाता है, लेकिन इस मरीज पर इनका कोई असर नहीं हो रहा था। यह कम्युनिटी में फैल रहे रेसिस्टेंट ऑर्गेज्म का एक भयावह उदाहरण था। नई दवाओं से मिला जीवनदान डॉ. चेतन गोयल और डॉ. सुनील कुमार ने हार नहीं मानी। पुरानी दवाएं बेअसर होने पर उन्होंने तुरंत इलाज की रणनीति बदली। मरीज को लिनेजोलिड और सेफ्टारोलिन जैसी उन्नत एंटीबायोटिक्स दी गईं। मरीज को लंबे समय तक वेंटिलेटर की आवश्यकता थी, इसलिए चिकित्सकों ने मरीज की ट्रैकियोस्टोमी करने का निर्णय लिया। यह निर्णय सही साबित हुआ। धीरे-धीरे मरीज की हालत में सुधार होने लगा। संक्रमण कम हुआ और फेफड़ों ने काम करना शुरू कर दिया। डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई। मरीज की हालत अब स्थिर है और उन्हें टी-पीस पर रखा गया है। जल्द ही उनकी ट्रैकियोस्टोमी ट्यूब हटा दी जाएगी और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी।
चेयरमेन राहुल अग्रवाल ने बताया कि एक समय जहाँ परिवार ने उम्मीद छोड़ दी थी, वहां आज मरीज अपने पैरों पर वापस खड़ा होने को तैयार है। यह सफलता केवल दवाओं की नहीं, बल्कि समय पर लिए गए निर्णयों और आईसीयू टीम के बेहतरीन तालमेल का परिणाम है। यह केस साबित करता है कि कठिन से कठिन चिकित्सकीय परिस्थितियों में भी यदि सही समय पर सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो जीवन बचाया जा सकता है।













