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इतिहास के सभी स्त्रोतों का दोहन आवश्यक : सारंगदेवोत

BY — March 18, 2015

‘राजस्थान इतिहास के स्त्रोत’ विषयक पर कार्यशाला

180306उदयपुर। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के संघटक माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के इतिहास विभाग की ओर से बुधवार को महाविद्यालय के सिल्वर जुबली हॉल में ‘राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत’ विषयक कार्यशाला हुई।

मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. एसएस सारंगदेवोत, सम्मानित अतिथि पूर्व कृषि मंत्री सवाई हरि सिंह चुण्डावत, विशिष्ठ अतिथि इतिहासविद् प्रो. केएस गुप्ता, मुख्य वक्ता प्रो. एस.पी. व्यास थे। अध्यक्षता डीन कला संकाय प्रो. प्रदीप पंजाबी ने की।
180307स्वागत उद्बोधन विभागाध्यक्ष प्रो. नीलम कौशिक ने दिया। मुख्य वक्ता प्रो. एसपी व्यास ने कहा कि इतिहास लेखन में इतिहास के रूप में सभी प्रकार के संसाधनों, समीक्षात्मक विषलेश्ण कर प्रयोग करना चाहिए। तत्कालीन साहित्यिक सामग्री, ऐतिहासिक अभिलेख, भाषा, कला, संस्कृति, लोक गीत, काव्य संग्रह आदि भी हमारे राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत हैं, जिससे हमें महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। किसी भी प्रकार की सामाजिक संरचना, लोक साहित्यिक, व्यापारिक परम्परा, तकनीकी साहित्य में भी राजस्थान का इतिहास जीवंत है। मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि राजस्थान के इतिहास को समझने के लिए उत्पादन के साधनों को जानना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। इन उत्पादनों के साधनों से ही राजस्थान का समग्र रूप इतिहास लिखना संभव है। उत्पादन के साधनों के द्वारा ही राजस्थान की विरासत को समझा जा सकता है। संचालन डॉ. हेमेन्द्र चौधरी ने किया जबकि धन्यवाद गिरीश पुरोहित ने दिया।
इन मोनोग्राफ व शोध जर्नल का हुआ विमोचन : प्रो. नीलम कौशिक तथा डॉ. हेमेन्द्र चौधरी लिखित इतिहास विभाग की शोध पत्रिका  विरासत तथा विभागीय सदस्यों द्वारा लिखित मोनोग्राफ महाराजा राजसिंह, महाराणा कुंभा, वागड़ की महिला स्वतंत्रता सेनानी के मूर्ति कला में अभिव्यक्त धूलजी भाई भावसार के मोनोग्राफ का विमोचन किया।

admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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