पीएमसीएच में सामने आया दुर्लभ बीमारी का अनोखा मामला
दुनियाभर में 1000 केसेज आए है सामने
उदयपुर। चिकित्सा जगत अपनी जटिलताओं और अनोखे मामलों के लिए जाना जाता है, लेकिन हाल ही में उदयपुर में एक ऐसा दुर्लभ मामला सामने आया है जिसने रेडियोलॉजिकल रिपोर्ट्स और मरीज की शारीरिक स्थिति के बीच के सामान्य तालमेल को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में एक 34 वर्षीय महिला में पल्मोनरी एल्वोलर माइक्रोलिथियासिस (पाम) नामक अत्यंत दुर्लभ फेफड़ों की बीमारी की पुष्टि हुई है। दरअसल पेशे से किसान 34 वर्षीय एक महिला को सांस लेने में हल्की तकलीफ की शिकायत के चलते परिजनो ने पीएमसीएच के चेस्ट एवं टी.बी. रोग विभाग के डॉ.आमिर शौकत को दिखाया। मरीज को न तो खांसी थी, न ही सीने में दर्द और न ही बुखार। चिकित्सकीय जांच में उसके फेफड़े सामान्य रूप से काम करते प्रतीत हो रहे थे और उनका ऑक्सीजन लेवल भी 98 था, जो कि पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति का होता है। लेकिन जब उनका चेस्ट एक्स-रे किया गया, तो रिपोर्ट देख डॉक्टर हैरान रह गए। एक्स-रे में दोनों फेफड़ों में रेत के कणों जैसी असंख्य छोटी-छोटी गांठें दिखाई दीं। मेडिकल भाषा में इसे सैंडस्टॉर्म अपीयरेंस कहा जाता है। एक्स-रे की गंभीरता को देखकर ऐसा लग रहा था कि मरीज की हालत बहुत नाजुक होनी चाहिए, लेकिन हकीकत में मरीज बिल्कुल सामान्य और स्थिर थी। डॉ.आमिर शौकत ने बताया कि मरीज की एचआरसीटी स्कैन जॉच रिपोर्ट में फेफड़ों के अंदर कैल्शियम फॉस्फेट के छोटे-छोटे पत्थर जमा पाए गए, जिन्होंने फेफड़ों को पत्थर जैसा सख्त बना दिया था।

पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ.आमिर शौकत ने बताया पल्मोनरी एल्वोलर माइक्रोलिथियासिसएक आनुवंशिक बीमारी है जो SLC34A2 जीन में म्यूटेशन के कारण होती है। इस खराबी के कारण फेफड़ों की कोशिकाओं में फॉस्फेट का परिवहन ठीक से नहीं हो पाता और वहां कैल्शियम जमा होने लगता है। यह बीमारी इतनी धीमी गति से बढ़ती है कि मरीज को सालों तक इसका पता नहीं चलता, जबकि उनके फेफड़े अंदर ही अंदर पत्थरों से भर रहे होते हैं। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसका इलाज है। अच्छी बात यह है कि इस मरीज में अभी कोई गंभीर लक्षण नहीं हैं। इसलिए, पीएमसीएच के चिकित्सको ने वेट एंड वॉच की नीति अपनाई है। मरीज को फ्लू और निमोनिया के टीके लगाने और नियमित जांच कराने की सलाह दी गई है। अभी तक दुनियाभर में 1000 केस इस तरह की बीमारी के सामने आए है।
डॉ.आमिर ने बताया कि, दुनिया में अभी ऐसी कोई दवा नहीं बनी जो फेफड़ों में जमे इन माइक्रोलिथ्स (पत्थरों) को गला सके। जब बीमारी अंतिम चरण में पहुँचती है, तब लंग ट्रांसप्लांट ही मरीज को बचाने का एकमात्र कारगर उपाय होता है। अच्छी बात यह है कि ट्रांसप्लांट के बाद इस बीमारी के दोबारा होने की संभावना बेहद कम होती है। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में अक्सर फेफड़ों में ऐसे धब्बे दिखने पर उसे टीबी या सिलिकोसिस मानकर इलाज शुरू कर दिया जाता है। पीएमसीएच के चिकित्सकों की सूझबूझ और सही निदान ने मरीज को अनावश्यक दवाइयों के दुष्प्रभाव से बचा लिया। चूंकि यह बीमारी अनुवांशिक है, इसलिए मरीज के परिवार के अन्य सदस्यों की भी स्क्रीनिंग की सलाह दी गई है। उन्हें नियमित जांच के लिए बुलाया गया है ताकि बीमारी के बढ़ने की गति पर नजर रखी जा सके। इस मरीज की बीमारी की पहचान में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ.आमिर शौकत के साथ साथ डॉ.अतुल लुहाडिया,डॉ.निश्चय,डॉ.अरविंद,डॉ.ड्यू और तकनीशियन लोकेन्द्र,दीपक और नर्सिंग स्टाफ राम प्रसाद का महत्वपूर्ण योगदान रहा।













