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210 दिनों के संघर्ष के बाद जीवन्ता के चिकित्सकों ने दिया नया जीवन

| January 11, 2018 | 0 Comments

भारत एवं दक्षिण एशिया के सबसे छोटे शिशु का दावा

उदयपुर। जब इस दुनिया में आई एक नन्ही सी जान जिसका वजन था मात्र 400 ग्राम कहते हैं, भगवान लड़कियों को संघर्ष करने की अजीब शक्ति देता है. और इसी शक्ति व आशीर्वाद के साथ में आई ये 400 ग्राम की नन्ही सी जान, जो सिर्फ पूरे भारत में ही नहीं बल्कि पूरे साउथ एशिया की सबसे छोटी व कम वजनी नवजात है और आज 7 महीनो के जीवन और मौत के बीच चले लम्बे संघर्ष के बाद अपने घर जा रही है।

खतरे में थी माँ और बच्ची की जान : कोटा निवासी सीता गिरिराज दम्पति को शादी के 35 वर्षों बाद माँ बनने का सौभाग्य मिला, किन्तु माँ का ब्लड प्रेशर/ रक्तचाप बेकाबू हो गया था और सोनोग्राफी से पता चला की भ्रूण को रक्त का प्रवाह बंद हो गया है, तभी आपातकालीन सीजेरियन ऑपरेशन से शिशु का जन्म 15 जून 2017 को कराया गया. .. जन्म पर शिशु का वजन मात्र 400 ग्राम था . जन्म के बाद शिशु नाही तो खुद से सांस ले पा रही थी एवं शरीर नीला पड़ रहा था .शिशु को जन्म के तुरंत बाद जीवन्ता हॉस्पिटल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई में शिफ्ट करके नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ सुनील जांगिड़, डॉ निखिलेश नैन एवं उनकी टीम के द्वारा शिशु की देखभाल की गयी .
डॉ सुनील जांगिड़ ने बताया कि इतने कम वजन के शिशु को बचाना हमारे टीम के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी . अब तक भारत एवं पुरे दक्षिण एशिया में इतने कम वजनी शिशु के अस्तित्व की कोई रिपोर्ट नहीं है . इससे पूर्व में भारत में अब तक 450 ग्राम वजनी शिशु का मोहाली चंडीगढ़ में सन 2012 में इलाज हुआ है। शिशु को तुरंत वेंटीलेटर पर लिया गया . प्रारंभिक दिनों में शिशु की नाजुक त्वचा से शरीर के पानी का वाष्पीकरण होने के वजह से उसका वजन 360 ग्राम तक आ गया था . पेट की आंतें अपरिपक्व एवं कमजोर होने के कारण , दूध का पचन संभव नहीं था. इस स्थिति में शिशु के पोषण के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व – ग्लूकोज़, प्रोटीन्स एव वसा उसे नसों के द्वारा दिए गए. धीरे धीरे बून्द बून्द दूध, नली के द्वारा दिया गया. परन्तु शिशु को दूध पचाने में बार बार परेशानी आती थी और उसका पेट फूल ज्याता था . 7 हफ़्तों बाद शिशु पूरा दूध पचाने में सक्षम हुआ और 4 ½ महीनो बाद मुँह से दूध लेने लगा . शिशु को कोई संक्रमण न हो इसका विशेष ध्यान रखा गया. शुरुवाती दिनों में श्वसन प्रणाली एवं मस्तिष्क की अपरिपक्वता के कारण , शिशु सांस लेना भूल जाता था एवं शिशु को कृत्रिम सांस की जरुरत पड़ती थी. शिशु को 4 बार खून भी चढ़ाया गया . शिशु की 210 दिनों तक आई सी यु में देखभाल की गयी . नियमित रूप से मस्तिष्क एवं ह्रदय की सोनोग्राफी भी की गयी जिससे आतंरिक रक्तस्त्राव तो नहीं हो रहा है को सुनिश्चित किया जा सके. आँखों की नियमित रूप से चेक अप किया गया . और आज 7 महीनो के कठिन मेहनत के बाद बच्ची का वजन 2400 ग्राम हो गया है, और पूरी तरह से स्वस्थ है। जीवन्ता नर्सिंग स्टाफ के अनुसार यह नन्ही सी परी बहुत ही सुन्दर है एवं मिस वर्ल्ड से कम नहीं है और इसका नाम मानुषी रखा है।
क्या कहते है एक्सपर्ट –
सीनियर प्रोफेसर निओनेटोलॉजी भारती यूनिवर्सिटी पुणे , डॉ प्रदीप सूर्यवंशी ने बताया की ऐसे कम दिन एवं बच्चे का शारीरिक सर्वांगीण विकास पूरा हुआ नहीं होता , शिशु के फेफड़े , दिल, पेट की आते , लिवर, किडनी, दिमाग, आँखें, त्वचा आदि सभी अवयव अपरिपक्व, कमजोर एवं नाजुक होते है और इलाज के दौरान खाफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है. I हमेशा आप को एक नाजुक सी डोर पे चलना होता है और कभी कभी सारी कोशिशों के बाद भी सफलता नही मिल पाती. हलकी सी आवाज, हलचल या ज़रा सी भी ज्यादा दवाई की मात्रा से ऐसे शिशु के दिमाग में रक्तस्त्राव होने का खतरा होता है.बेहतरीन इलाज़ के बावजूद भी केवल 0. 5% शिशु मस्तिष्क क्षति के बिना जीवित रहते है.
डॉ अजय गंभीर , पूर्व नेशनल प्रेजिडेंट राष्ट्रीय नवजात स्वास्थ्य संघटन ने बताया की “ हम सीता और उसके परिवार का आभार व्यक्त करते हैं और सराहना करते है की उन्होंने समाज के सामने नया उदाहरण दिया है. जहाँ राजस्थान में आज भी लड़कियों को बोझ समझा जाता है , जन्म के तुरंत बाद कूड़े में फेंक दिया जाता है या अनाथाश्रम में छोड़ दिया जाता है . सीता दम्पति ने ऐसे बच्ची का पूरा इलाज कराया जिसके बचने की संभावना नहीं के बराबर थी और आज वही बच्ची पूरी तरह से स्वस्थ है और अपने घर जा रही है “
डॉ एस के टाक ने बताया की आज कल नवीनतम अत्याधुनिक तकनीक , अनुभवी नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉक्टर्स व प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की टीम से 500 से 600 ग्राम के प्रीमैचुअर शिशु का बचना भी सम्भव हो चूका है. जीवन्ता हॉस्पिटल ने पिछले 3 साल में कई 6 मासी गर्भावस्था एव 500 से 600 ग्राम के बच्चों का सफल इलाज किया है .

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