झीलों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता

BY — September 5, 2011
मन को सुखद अनुभूति देने वाला फतह सागर ओवर फ्लो का नज़ारा.
यु आई टी पुलिया के ऊपर से बहता पानी.
मन को सुखद अनुभूति देने वाला स्वरुपसागर (पीछोला) ओवर फ्लो का नज़ारा.

शहर की विश्व प्रसिद्द झीलें फतह सागर और पीछोला दोनों लबालब होकर छलक गई हैं. शहरवासियों के चेहरे की रौनक देखते ही बन रही है. अब नज़रें उदय सागर तथा जयसमंद की ओर ताकने लगी है. अगर इन्द्रदेव की मेहर रही तो उदयपुर को वर्ष भर पेयजल उपलब्ध कराने वाली ये दोनों झीलें शीघ्र ही भर जायेंगी. स्थानीय लोगों के साथ जो बाहर हैं, उनकी भी शुभ कामनाएं यहाँ तक पहुँच रही हैं, लेकिन क्या हर बार की तरह इस बार भी झीलों का आने वाले समय में वही हश्र होगा जो हर बार होता है. हर बार झीलें छलकती हैं, लोगों के चेहरे पर खुशी आती है, फिर जल कुम्भी अपने पैर पसारती है, शहर के कुछ गिने-चुने जागरूक व वरिष्ठ नागरिक झीलें साफ़ करते हैं लेकिन उनका वह प्रयास मात्र सूरज को दीया दिखाने के समान रहता है. मानसून आते ही सभी जागते हैं लेकिन पानी भरते ही वापस सभी वहीँ के वहीँ. हम क्यूँ हर बार बारिश के भरोसे रहते हैं, क्यूँ झीलों को हर समय भरा नहीं रख सकते. क्यूँ हर बार ओवर फ्लो देखने के लिए हमें वर्ष भर इंतज़ार करना पड़ता है. क्यूँ हर बार पानी को लेकर राजनीति होती है. गंदगी झीलों में नहीं डालें, निर्माण निषेध क्षेत्र में निर्माण नहीं हों, इस बारे में उच्चतम न्यायालय के आदेश भी हैं लेकिन फिर भी झीलों के किनारे पर्यटकों के नाम पर होटल बनाने वाले कोई ना कोई गली निकाल ही लेते हैं और काम चलता ही रहता है. चाहे वह पीछोला हो या फतह सागर, सभी के आसपास कोई ना कोई निर्माण होते ही रहते हैं. जिस प्रकार अन्ना हजारे के समर्थन में पूरा देश आगे आया ठीक उसी प्रकार उदयपुर की झीलों के लिए क्यूँ हर उदयपुरवासी आगे नहीं आता. क्या झीलों के प्रति प्रेम सिर्फ दिखावटी है. नहीं, दिखावटी नहीं लेकिन किसी के पास समय नहीं है. झीलों में गंदगी ना डालें, जो डालता हो, उसे भी रोकें और सबसे पहले खुद ही यह संकल्प करें कि मैं झील को साफ़ रखने में हरसंभव सहायता करूँगा. झील पेटा क्षेत्र में होने वाले अवैध निर्माण के प्रति सजगता बरतें, ना सिर्फ आम जन बल्कि सरकारी मशीनरी भी. वर्ष २००६, २०१० और २०११ में इन्द्रदेव की झीलों पर मेहर हो गई. इस बार का सीज़न फिर अच्छा जायेगा. व्यापारियों के लिए यहाँ का सीज़न बारिश ही तय करती है लेकिन उसे बरकरार रखना भी हमारी ही जिम्मेदारी है. समय सिर्फ खुश होने का ही नहीं बल्कि झीलों को आगे भी भरा रखने के प्रयास करने का है.

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

7 Responses

  1. इस नजारे को कभी नहीं भूल सकता …. 13 अगस्‍त 2006 को जब फतह सागर छलका था तो उससे छह माह पहले मैने उसकी तलहटी भी देखी थी। सुनील अच्‍छा लगा यहां देखकर… सुधार की बहुत गुंजायश अभी बाकी है। लगे रहें… मेरी शुभकामनाएं हैं।

    1. संजय जी, आपको कैसे भूल सकते हैं. आपसे संपर्क बहुत दिनों बाद हुआ है. आपका यही उत्साह वर्धन हमें और आगे जाने की ओर प्रेरित करता है. शुक्रिया.

  2. photo bahut he sunder hai uit puliya par jo pani ja raha hai wo mene pahle kabhi nahi dekha tha bahut accha laga. me hindi me likhna cahti hu par likh nahi pa rahi hu please meri halp kariye.

    1. मेम, आप हिंदी में ना लिख सकें, कोई बात नहीं.. आपने रिएक्ट किया, वही बहुत है…. शुक्रिया…आपके उत्साह वर्धन के लिए..

  3. सर फोटो बहुत अच्छे है, साथ ही झीलों के प्रति आपके विचार भी प्रसंशा के योग्य है.

    1. धन्यवाद हंसराज जी, जब भी साईट पर आयें, ऐसे ही अपनी निशानी छोड़ कर जाएँ.

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