तब का मेटल कॉर्पोरेशन आज का हिन्द जिंक

BY — October 23, 2011

के. पी. गुप्ता [सेवानिवृत्त समूह महाप्रबंधक, आरएसएमएम]

कॉलम : अतीत के आईने से

उस समय मेटल कॉर्पोरेशन के चीफ थे ए. सी. दत्ता और बीकानेर जिप्सम लि एक कंपनी थी. मेटल • कॉर्पोरेशन बाद में बना हिन्दुस्तान जिंक और बीकानेर जिप्सम बदला आरएसएमएम में। यह बदलाव तब हुआ  जब राजस्थान सरकार ने बीकानेर जिप्सम के शेयर खरीद लिए। इसी प्र•कार मेटल कॉर्पोरेशन का बदलाव हिन्द जिंक  में तब हुआ जब भारत सरकार ने अधिग्रहण कर अपना उपक्रम बनाया। 1971 में मुझे झामर कोटड़ा में माइंस एक्ट के तहत माइंस मैनेजर बनाया गया। यहां से झामर कोटड़ा जाते समय सूखा नाका होकर जाते थे। नाम उसका भले ही सूखा नाका लेकिन जीप के चक्के वहां बहते हुए पानी में पूरे डूब जाते थे। इतना पानी बहता था। उदयसागर का पानी भी काफी साफ था। वहां पिकनिक मनाने अमूमन सप्ताह में एक बार तो जाया ही करते थे। फिर जब मकान बनाने की सोची तब यहां का सबसे प्राइम और शांतिपूर्ण एरिया था मधुवन, चेटक. मगर उस समय मकान नहीं ले पाए। आज तो वहां वाणिज्यि• गतिविधियां इतनी हो गई हैं कि सोचते ही डर लगता है कि अगर मकान ले लिया होता तो वापस भागना पड़ता। 1977 में फिर यहां डायरेक्ट्रेट ऑफ माइनिंग सेफ्टी और भारतीय खान ब्यूरो का कार्यालय खुला। उस समय फैक्ट्रियों में यूनियनबाजी पूरे चरम पर थी। मेज़र चेंज यहां आया 80  के बाद जब सोप स्टोन और मार्बल का यहां प्रवेश हुआ। यहां के बड़ा बाजार, मालदास स्ट्रीट के लोग सारे मार्बल क्षेत्र में चले गए। उससे शहर की पोलोग्राउण्ड और सहेलीनगर का विकास हुआ.
मैं सबसे पहले 1960 में ट्रेनिंग लेने उदयपुर आया था, तब और आज के उदयपुर में जमीन आसमान का फर्क है। हर जगह, हर वर्ग, हर स्थान पर चेंज आ गया है। मैं चूंकि इंडस्ट्री का आदमी हूं इसलिए उसी क्षेत्र में हुए चेंजेज़ के बारे में बता रहा हूं। यहां आते ही झामर कोटड़ा ट्रेनिंग के लिए गया तब बस में जाना पड़ता था. झामर कोटड़ा जाने में दो घंटे से अधिक समय लगा था उस समय। रेलवे स्टेशन भी राणा प्रताप नगर ही था. उस समय वाहन तो थे ही नहीं। या तो तांगे थे या फिर साइ•िल। इक्•ा-दुक्•ा गाडिय़ा सड़• पर दिखती थीं लेकिन आज वाहनों के बीच सड़क ढूंढना मुश्किल है. उस समय गाडिय़ों के नम्बर उदयपुर में आरजेवाई चलते थे और अजमेर का आरजेजेड हुआ, क्योंकि अजमेर का विलय राजस्थान में बाद में हुआ इसलिए उदयपुर के  बाद उसका नम्बर आया। बाकि अल्फाबेट के अनुसार ए टू जेड के अनुसार लास्ट में वाई यानी उदयपुर था।
उसके बाद नौकरी के लिए 1969 में आया तब मेरी नियुक्ति आरएसएमएम में हुई थी। यह आज भी कई लोगों को मालूम नहीं होगा. साथ ही यह जानकर गर्व भी होगा कि देश भर के रॉक फास्फेट का 18 प्रतिशत इसी उदयपुर की झामर कोटड़ा इकाई में होता है। बाकी एक प्रतिशत मटून, कानपुर, झाबुआ वगैरह में होता है। शेष 81 प्रतिशत आयात किया जाता है, जिस समय रियासतों का विलीनी•रण हो रहा था उस समय राजस्थान में अजमेर पूरा अलग स्टेट था। उसके मुख्यमंत्री हरिभाऊ उपाध्याय थे। बाद में यह राजस्थान में मिल गया. प्रत्येक  संभाग मुख्यालयों पर बंटवारा किया गया तो जैसे जयपुर को राजधानी, जोधपुर को हाईकोर्ट कोटा को  चम्बल और उदयपुर को [डीएमजी एवं ट्राइबल कमिश्नर मुख्यालय] मिला। इसी क्रम में सभी जगह रेलवे डीआरएम मिला लेकि न उदयपुर को इसकी भरपाई मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिय़ा ने जोनल ट्रेनिंग स्कूल [रेलवे ट्रेनिंग स्कूल] खुलवाकर की.
आज शिक्षा का स्तर काफी गिर गया है। लोगों की आर्थिक स्थिति भले ही सुदृढ़ हो गई है लेकिन वृद्धों के प्रति युवाओं में लिहाज, नैतिकता खत्म हो गई है। अधिकारियों के सामने उस समय हिम्मत नहीं होती थी देखने की.
[जैसा उन्होंने udaipur news को बताया]

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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