शौर्य एवं भक्ति ने बनायी मेवाड़ की पहिचान

BY — January 8, 2016

080104उदयपुर। विश्व में मेवाड़ की पहिचान सिर्फ शोर्य के रूप में ही नहीं वरन् भक्ति के रूप में भी बनी हुई है। मेवाड़ में ऐसे-ऐसे सन्त हुए जिन्हें बहुत कम लोग जानते है। उन सन्तों की भक्ति की महक आज भी मेवाड़ के कण-कण में विद्यामान है। मेवाड़ में राठौड़ों का आगमन चुण्डावतों के समय ही हो गया था। मेवाड़ की पहिचान हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में भी बनी हुई है।

यह कहना था ‘मेवाड़ संत, परम्परा व सेवा’ पुस्तक के रचयिता भगवानलाल शर्मा प्रेमी का, जो रोटरी क्लब उदयपुर द्वारा आयोजित उक्त विषयक वार्ता में मुख्य वक्ता के रूप में बाले रहे थे। उन्होंने कहा कि मेवाड़ की धरती पर सरदारगढ़ से महात्मा भूरि बाई,ठाकुर गुमानसिंह,बावजी चतरसिंह, भक्त कवि रामसिंह राठौड़ सहित अनेक सन्त हुए जिन्होंने भक्ति की गंगा में न केवल स्वयं डूबकी लगाई वरन् औरों को भी डूबकी लगवाकर उनके जीवन का कल्याण किया ओर आज भी वे इसी कारण से पहिचाने जाते है।
मेवाड़ की शोर्य एवं भक्ति का लोहा स्थानीय जनता ही नहीं वरन् मुगल दरबारी भी मानते थे। महात्मा भूरि बाई ने अल्प आयु में ही विधवा होने के पश्चात योगिनी नूरी बाई के सानिध्य में आने के बाद अपने जीवन जीने का तरीका ही बदल दिया था। उन्होंने अपनी भक्ति से अपनी निद्रा एवं भूख पर विजय प्राप्त कर ली थी।
मेवाड़ की धरती पर जन्म लेने वाले ठाकुर गुमानसिंह ने मेवाड़ क्षेत्र में अपनी शोर्यता एंव भक्ति  से इस क्षेत्र का नाम रोशन किया। साधु-सन्तों के साथ बैठकर तीर्थ स्थालों पर जा कर  धार्मिक क्षेत्र में नयी खोज करना उनकी प्रवृत्ति बन गई थी। अति व्यस्त होने के बावजूद जीवन में वे धर्म के मार्ग पर नियमित रूप से चलना उनकी नियती बन चुकी थी।
बावजी चतरसिंह ने अपनी पत्नी के निधन के बाद पुनर्विवाह नहीं करते हुए अपनी एक मात्र पुत्री के जीवन का कल्याण करना ही उनका एक मात्र लक्ष्य बन चुका था। उनकी पुत्री की भी मृत्यु के बाद वे अकेले रह गये ओर इसके बाद वे अपने परम शिष्य कीका डंागी के निवास पर आ कर रहने लग गये। राजघराने की प्रचलित प्रथा का उन्होंने विरोध किया था। भक्त कवि रामसिंह राठौड़ की शोर्यता का लोहा मुगल दरबारी भी मानते थे। मेवाड़ के महाराणा भी इनकी वीरता एवं शूरता के कायल थे। मात्र 3 वर्ष की उम्र में ही इनके पिता ने परम्परानुसार इन्हें रामस्नेही सम्प्रदाय को सौंपना पड़ा और वापस इनके वजन के बराबर चंादी दान दे कर इन्हें पुन: राजभवन में लाना पड़ा। इस अवसर पर क्लब अध्यक्ष गजेन्द्र जोधावत ने भी विचार व्यहक्त: किए। सचिव सुभाष सिंघवी ने कार्यक्रमों की जानकारी दी। प्रारम्भ में शीला तलेसरा ने ईश वंदना प्रस्तुत की जबकि अन्त में जावरीया ने स्मृति चिन्ह प्रदान किया।

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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