संत का जीवन नदी के प्रवाह की तरह

BY — June 30, 2017

उदयपुर। गणिनी आर्यिका सुप्रकाशमति माताजी ने कहा कि संत का जीवन नदी के प्रवाह की तरह होता है तो निरन्तर गतिमान रहता है।व्यक्ति का कभी तन तो कभी वस्त्र मेले होते है और कभी वह प्यासा होता है। व्यक्ति अपने तन एवं वस्त्रों को नदी में धो कर उसे उज्जवल कर देता है तो व्यक्ति नदी के जल से अपनी प्यास बुझा लेता। नदी सभी का ध्यान रख कर आगे बढ़तर रहती है।

वे आज हिरण मगरी से. 11 स्थित आदिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रही थी। उन्होेंने कहा कि समुद्र गम्भीर एवं बड़ा होता है लेकिन उसमें स्वच्छता नहीं होती है। उसका पानी खारा होता है। संत भी नदी का जल प्रयुक्त करता है क्योंकि वह जल प्रयोग लायक होता है लेकिन जब वहीं कहीं रूक जाता है तो बदबू मारने लगता है। वह किसी लायक नहीं रहता है। इसलिये संत भी नदी की भंाति निरन्तर गतिमान रहते है।
उन्होेंने कहा कि आत्म ज्योति को प्रकट करने के लिए साधना आवश्यक है। आत्म साधना के बिना ज्ञान की ज्योति प्राप्त नहीं होती है। ज्ञान की ज्योति आत्मा का अनूठा वैभव है लेकिन कर्मों के आवरण से वह आच्छादित है।
इससे पूर्व आज संस्कार यात्रा के साथ माताजी से.8 से विहार कर हिरणमगरी से. 11 स्थित आदिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर पंहुचे,जहंा ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक शाह के नेतृत्व में ट्रस्ट एवं मन्दिर के पदाधिकारियों द्वारा भव्य स्वागत किया गया। संस्कार यात्रा का अगला पड़ाव 2 जुलाई को गोवर्धनसागर स्थित लेक गार्डन रहेगा। जहंा भगवान शान्तिनाथ की महापूजा होगी। लेक गार्डन में रामगंज मण्डी से आये त्रिलोक सांवला परिवार द्वारा संस्कार यात्रा एवं माताजी की भव्य अगवानी की जाएगी।
आज आदिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर में आर्यिका 105 सुप्रकाशमति वर्षा योग चातुर्मास कमेटी की बैठक हुई।जिसमें सकल दिगम्बर जैन समाज ने चातुर्मास उत्साहपूर्वक आयोजित करने का संकल्प लिया।

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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