खुद को देखने का माध्यम है ध्यान: गुणमाला श्रीजी

BY — September 13, 2018

ध्यान दिवस पर तेरापंथ भवन में हुआ कार्यक्रम

उदयपुर। शासन श्री साध्वी गुणमाला ने कहा कि जब ध्यान में होते हैं तो न उपवास और न सामायिक की जरूरत होती है। प्रेक्षाध्यान में यही बताया गया है। आत्मा के द्वारा आत्मा को देखना। अपनी आंख से सबको देख सकते हैं लेकिन खुद को देखने के लिए कोई माध्यम चाहिए। वो है दर्पण। ध्यान ऐसा ही दर्पण है। तराजू के दो पलड़े होते हैं। अगर कुछ न हो तो दोनों पलड़े संतुलित रहते हैं।

वे गुरुवार को अणुव्रत चैक स्थित तेरापंथ भवन में पर्युषण के सातवें दिन ध्यान दिवस पर धर्मसभा को संबोधित कर रही थी। उन्होंने कहा कि आत्मा में भी कभी राग और कभी द्वेष का पलड़ा भारी रहता है। ध्यान में इन दोनों को निकालना पड़ता है। ध्यान की गहराई में जाने पर पदार्थ की सीमा संकुचित हो जाती है। उसके प्रति आसक्ति कम हो जाती है। ध्यान न शास्त्र है न शस्त्र। ध्यान एक वैज्ञानिक पद्धति है। ध्यान को वाद विवाद, दर्शन-प्रदर्शन की प्रक्रिया से निकालें। इसकी प्रक्रिया को समझें।
प्रेक्षाध्यान का उद्देश्य शरीर की साधना है। ध्यान नियंत्रण सिखाता है। कायोत्सर्ग के माध्यम से हम समस्त जगत को पहचान सकते हैं। आत्मा और शरीर की भिन्नता को कायोत्सर्ग के माध्यम से जाना जा सकता है। ध्यान करना और ध्यान को पचाना दोनो अलग बातें हैं। मस्तिष्क पर नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं ध्यान के माध्यम से। आनंद हमारे भीतर है। ध्यान को प्रेक्षाध्यान में इस तरह बद्ध किया गया है जो किसी धर्म में नही मिलती। एक घंटा आंख बंद कर बैठना यानी समय व्यर्थ करना नही है। धीरे धीरे इसका वैज्ञानिक अर्थ समझ में आया। इसके अच्छे परिणाम आये। मन के मनोबल को बढ़ाने के लिए ध्यान आवश्यक है। इसके तरीके में थोड़ा फर्क है। ध्यान से चलना, ध्यान से बैठना, बिना ध्यान के कुछ नही लेकिन वो भौतिक ज्ञान है। इसके साथ आध्यात्मिक ज्ञान भी जरूरी है।
साध्वी श्री लक्ष्यप्रभा, साध्वी प्रेक्षाप्रभा और साध्वी नव्यप्रभा ने कहा कि पर्युषण में अनेक आध्यात्मिक अनुष्ठान किये गए हैं। कल संवत्सरी मनाई जाएगी। भगवान महावीर ने बड़ी तपस्याएं की लेकिन ध्यान भी कम नही किया। समय, काल के अनुसार ध्यान का क्रम चला। आम जनता के साथ ध्यान का तारतम्य नही बना। इस दौरान ध्यान की परंपरा छिन्न भिन्न हो गयी। आचार्य महाप्रज्ञ ने जब नथमल के रूप में आचार्य तुलसी के समक्ष ध्यान की बात रखी तो उन्होंने नथमल जी को इस पर विचार करने को कहा। नथमलजी की दृढ़ संकल्पता, प्रज्ञता ने ध्यान पद्धति को प्रेक्षाध्यान के रूप में सृजित किया।
सभा के मंत्री प्रकाश सुराणा ने बताया कि उपासक श्रेणी के शिविरार्थियों ने सामूहिक गीतिका प्रस्तुत की। उपासक शिविर में 60 श्रावक-श्राविकाएं पूरे समय सभा भवन में ही रहकर धर्मोपासना कर रहे हैं। आनंदनगर की बहनों ने मंगलाचरण किया। सांयकालीन कार्यक्रमों में भी समाजजन उत्साह से भाग ले रहे हैं।

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admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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