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विदेशों में कम खर्च में पढ़ाई करने के खुले हैं द्वार

BY — July 10, 2024

एमबीबीएस में सरकारी कॉलेज नहीं मिलने पर घबराएं नहीं
सुनील गोठवाल

उदयपुर। भारत में जनसंख्या को देखते हुए चिकित्सकों की कमी साफ दिखाई देती है। कई बच्चे चिकित्सक बन कर मरीजों की सेवा करना चाहते हैं लेकिन अवसर का अभाव होने के कारण वे एमबीबीएस नहीं कर पाते हैं। सरकार की ओर से भी एमबीबीएस करने के लिए काफी कम सीट हैं।

एमबीबीएस में सरकारी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए साल में एक बार परीक्षा होती है जिसमें लगभग 24 लाख परीक्षार्थी अपना भाग्य आजमाते हैं जिसमें 13 लाख से ज्यादा परीक्षार्थी एमबीबीएस में प्रवेश लेने के लिए योग्य पाए गये लेकिन 55 हजार परीक्षार्थियों को ही सरकारी कॉलेज में सीट मिल पाती है और निजी महाविद्यालयों में करीब 53 हजार सीट हैं। जिन विद्यार्थियों को भारत में सरकारी कॉलेज नहीं मिलते वे निजी कॉलेज की ओर कदम बढ़ाते हैं लेकिन इनकी फीस बहुत अधिक है इस कारण ज्यादातर विद्यार्थी चिकित्सक बनने का सपना त्याग देते हैं। ऐसे लाखों विद्यार्थियों के चिकित्सक बनने के सपने को कुछ देश पूरे कर रहे हैं। भारत से हर साल 20 हजार से ज्यादा विद्यर्थी एमबीबीएस करने के लिए विदेशों में जा रहे हैं और डीग्री प्राप्त करके भारत में अपनी कुशल सेवाएं दे रहे हैं।
एपेक्स एजूकेशन की डायरेक्टर चंदा जैन ने बताया कि किर्गिज़स्तान, कज़ाखस्तान, जॉर्जिया, बारबडोस और अन्य देशों की एमबीबीएस की भारत के विद्यार्थियों में अच्छी मांग है । वहां एमबीबीएस करने पर अधिकतम 30 से 35 लाख तक खर्च होता है जबकि भारत में यही खर्चा 70 लाख से एक करोड़ तक होता है। विदेश में एमबीबीएस की पढ़ाई भारतीय एमबीबीएस की तरह ही होती है । वहां से डिग्री करने के बाद भारत में प्रेक्टिस करने के लिए एक परीक्षा पास करनी होती है । इस परीक्षा की तैयारी भी वहां के कॉजेल में श्रेष्ठ भारतीय प्रोफसर्स द्वारा करवायी जाती है। दक्षिण राजस्थान के सैंकड़ों विद्यार्थी कार्गिजस्तान में जाकर एमबीबीएस कर रहे हैं और भविष्य में ये संख्या और भी बढ़ेगी। राजस्थान में विदेशों में जाकर एमबीबीएस करने को लेकर जागरूकता का अभाव है लोगों को वहां जाकर पढ़ाई करने में डर लगता है जबकि वहां रहकर पढ़ाई करना भारत की तरह सुरक्षित है।

admin

doing active journalism from last 16 yrs. worked in leading news papers rajasthan patrika, dainik bhaskar.

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