उदयपुर कोर्स ऑन न्यूरोसाइंसेज’ के 12वें राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन
उदयपुर। चिकित्सक तन का इलाज करते है और आध्यात्म मन का। अधिकतर बीमारी तन से नही मन से आती है। इसलिए मनुश्य को अपने विचारों में हमेषा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। क्योंकि बीमारी तन मे दिखती है लेकिन प्रगट हमारे विचारों में होती हैं। बीमारी का इलाज तो दवाइयों से हो जाता है लेकिन मन के अन्दर का इलाज आध्यात्म,पवित्र विचार और ईष्वर की षरणागत से होता है। यह कहना जैन संत पुलक सागर जी महाराज का। संत पुलक सागर ने यह विचार पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के पेसिफिक सेंटर ऑफ न्यूरो साइंसेज की ओर से न्यूरोथियोलॉजी बिशय पर सुखाड़िया रंगमंच, नगर निगम परिसर, टाउन हॉल, उदयपुर में आयोजित उदयपुर कोर्स ऑन न्यूरोसाइंसेज के 12वें राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए कहे। जैन संत पुलक सागर जी महाराज ने “वर्तमान भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों में आध्यात्मिकता की भूमिका” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार आध्यात्मिकता है। उन्होंने कहा कि हमारी परंपराएं, संस्कार और जीवनशैली सभी आध्यात्मिक मूल्यों से ओत-प्रोत हैं। यही कारण है कि भारत सदियों से ज्ञान, शांति और आत्मकल्याण का मार्गदर्शक रहा है। संत पुलक सागर ने बताया कि वर्तमान समय में भौतिकवाद और भागदौड़ भरी जिंदगी ने लोगों को मानसिक रूप से अशांत और असंतुलित बना दिया है। ऐसे में भारतीय संस्कृति में निहित आध्यात्मिकता ही वह आधार है, जो व्यक्ति को आंतरिक शांति, संतुलन और उद्देश्य की ओर ले जा सकती है। इस अवसर पर पेसिफिक मेडिकल विश्वविद्यालय के चेयरपर्सन राहुल अग्रवाल एवं प्रीति अग्रवाल ने उदयपुर कोर्स ऑन न्यूरोसाइंसेज के 12वें राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए डॉ. अतुलाभ वाजपेयी को षुभकामनाए प्रेशित करते हुए कहा कि आध्यात्मिकता और गाइडेड मेडिटेशन जैसे अभ्यास आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक संतुलन एवं नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

न्यूरोसाइन्सेस विभाग के प्रोफेसर एवं हेड डॉ.अतुलाभ वाजपेयी ने “न्यूरोधियोलॉजीः मानव, राष्ट्र और विश्व के उत्थान का मार्ग” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मानव मस्तिष्क की ऊर्जा और चेतना को सही दिशा में प्रयोग कर हम न केवल व्यक्तिगत जीवन को उत्कृष्ट बना सकते हैं, बल्कि समाज, राष्ट्र और समूचे विश्व के विकास में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। डॉ.वाजपेयी ने बताया कि न्यूरोधियोलॉजी एक उभरता हुआ विज्ञान है, जो मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र और ध्वनि (ध्वनि चिकित्सा) के आपसी संबंधों को समझने का कार्य करता है। उनका मानना है कि मंत्र, संगीत और सकारात्मक ध्वनियों का मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे तनाव, अवसाद और मानसिक रोगों का प्रभावी इलाज संभव है। कार्यक्रम में अध्यात्म का न्यूरोलॉजिकल एवं वैज्ञानिक आधार पर जानकारी दी। उन्होने कहा कि जैसा हम अक्सर बात करते हैं कि हमारा बुद्धिमान भागफल (आई.क्यू) को दर्शाता है दूसरा भावनात्मक गुणक (ए.क्यू) को दर्शाता है जो हमारे आपस में परस्पर स्नेह पूर्ण संबंधों का मानक है यह आई.क्यू लेफ्ट ब्रेन को नियंत्रित करने वाला होता है एवं एक्यू मुख्यतः राइट ब्रेन से नियंत्रित होता है जब राइट और लेफ्ट ब्रेन दोनों समन्वय से काम करते हैं तब एसक्यू स्प्रिचुअल इंटेलिजेंट का निर्माण होता है जोकि एक प्रकार की उच्च विद्वता का मानक है इसके निर्माण से हम जीवन में सुख शांति करुणा स्नेह की अनुभूति करते हैं एवं तनाव रहित रह पाते हैं स्प्रिचुअल इंटेलिजेंट के निर्माण में योग ध्यान प्राणायाम की महत्वपूर्ण भूमिका है।
ब्रह्माकुमारी संस्था के वरिष्ठ राजयोग प्रशिक्षक बी.के.गिरीश ने “सोल-ब्रेन इंटरफेस की खोज” विषय पर अपने शोध एवं विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि मानव मस्तिष्क और आत्मा के बीच गहरा संबंध है, जिसे अब चिकित्सा, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी समझा जा रहा है। उन्होंने इसे “सोल-ब्रेन इंटरफेस” का नाम दिया। बी.के.गिरीश ने बताया कि आधुनिक न्यूरोसाइंस जहां मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली को समझने में जुटा है, वहीं राजयोग ध्यान और आध्यात्मिक साधना आत्मा की ऊर्जा और चेतना के अनुभव को जागृत करती है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो रहा है कि ध्यान और सकारात्मक विचारधारा से मस्तिष्क की तरंगों में सकारात्मक परिवर्तन आता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य, निर्णय क्षमता और भावनात्मक संतुलन में सुधार होता है। ब्रह्माकुमारी संस्था की वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका बी.के.उषा ने “दैनिक जीवन में आध्यात्मिकता एवं गाइडेड मेडिटेशन” विषय पर एक प्रेरणादायक सत्र का आयोजन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता को जीवन में अपनाकर हम तनाव, चिंता और अशांति से मुक्त होकर संतुलित एवं सुखद जीवन जी सकते हैं। बी.के.उषा ने बताया कि आज का मानव भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा में इतना उलझ गया है कि वह अपने अंतर्मन की शांति और आत्मचिंतन को भूलता जा रहा है। ऐसे में गाइडेड मेडिटेशन एक सरल और प्रभावी साधन है, जिससे व्यक्ति स्वयं को पुनः जोड़ सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ध्यान कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच का एक गहरा संबंध है। गाइडेड मेडिटेशन के माध्यम से व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि एक शांत, शक्तिशाली और ज्योतिर्मय आत्मा है। यही अनुभव जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मकता और स्थिरता लाता है। इस अवसर पर अन्य न्यूरों विषेशज्ञों ने भी अपने विचार रखे। मंच संचालन डॉ.आनन्द गुप्ता द्वारा किया गया।













