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अब रेटिना रोगियों को मिलेगा उच्चस्तरीय इलाज

| July 18, 2015 | 0 Comments

अलख नयन मंदिर में लगी विश्व स्तरीय मशीनें, रेटिना सेन्टर के नवीनीकरण का उद्घाटन आज

180704उदयपुर। अब तक डायबिटीज एवं चोट लगने के कारण अपनी आंखों के खराब हुए पर्दे यानि रेटिना का ईलाज नहीं करा पा सकने वाले रोगियों के लिए अब खुशखबरी है कि अलख नयन मंदिर संस्थान ने रेटिनोपैथी रोगियों के लिए इस प्रकार की विश्व स्तरीय मशीनें लगायी है कि रोगी इन मशीनों के जरिये यहीं पर विश्व स्तरीय ईलाज कम दामों में कराकर अपने रेटिना को बचा सकते है। ऐसे रोगियों को अब अहमदाबाद या मुबंई जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

संसथान के मेडीकल डायरेक्टर डॉ. एलएस झाला ने आयोजित प्रेस वार्ता में बताया कि बताया कि पूर्व में ही संस्थान में संचालित अलख नयन रेटिना सेन्टर का विश्व स्तरीय मशीनें लगाकर उसका नवीनकीरण किया गया है। जिसका रविवार को संाय 5 बजे राज्य  गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया उद्घाटन करेंगे। रेटिना रोगियों के सफल ईलाज के लिए इसी संस्थान से फैलोशिप प्राप्त कर रेटिना में सर्जरी कर देश के ख्यातिप्राप्त मदुरै राज्य के अरविन्द हॉस्पीटल में कार्य कर चुके डॉ. साकेत आर्य ने इस संस्थान में अपनी सेवायें देनी प्रारम्भ कर दी है।
डॉ. झाला ने बताया कि इस अलख नयन रेटिना सेन्टर में करीब 1 करोड़ से अधिक की लागत वाली आंखों की सीटी स्केन (ष्शश्च)एवं ऐन्ज्यिोग्राफी करने वाली जैसी विश्व स्तरीय विटे्रक्टमी सहित अन्य मशीनें लगायी गई है ताकि रेटिना रोगी के ईलाज में आसानी हो सकें। इस प्रकार की मशीनें लगाने वाला यह दक्षिणी राजस्थान का एक मात्र आई हॉस्पीटल बन चुका है। इस प्रकार के ऑपरेशन बिना चीरफाड के यानि लेज़र से ही किये जाऐंगें। इन मशीनों से आंखों के पर्दे खिसकने पर उनका भी ईलाज किया जा सकेगा।
उन्होंने बताया कि डायबिटीज होते ही उसका सबसे पहला प्रभाव आंख पर पड़ता है और ऐसे में यदि उसकी समय पर जंाच नहीं करवायी तो रेटिना को काफी बड़ा नुकसान पंहुच सकता है। इस प्रकार की मशीनें लगने से आने वाले समय में डायबिटीज से खराब होने वाले पर्दे का ईलाज अब यहंा संभव हो पायेगा। देश में मोतियाबिंद के तो अनेक चिकित्सक ईलाज कर रहे है लेकिन रेटिना का ईलाज बहुत कम चिकित्सक कर पाते है।
कार्यकारी ट्रस्टी डॉ.लक्ष्मी झाला ने बताया कि डायबिटीज के कारण आंखें पर पडऩे वाले दुष्प्रभाव को देखते हुए जनता में इसके प्रति जागरूकता लाने के लिए मधुमेह रोग विशेषज्ञों के साथ मिलकर कार्य किया जाएगा। ठीक इसी प्रकार प्री-मेच्योर पैदा होने वाले बच्चों की आंखों में रेटिना पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाता है। ऐसे बच्चों के समय पर ईलाज उपलब्ध कराने के लिए बाल चिकित्सालयों से सम्पर्क कर रेटिनोपेथी ऑफ प्री मेच्योरिटी पर अभिभावकों को जागरूक करने हेतु कार्य किया जाएगा। उन्होंने बताया कि हॉस्पीटल में बिना किसी भेदभाव के एक एचआईवी पॉजेटिव महिला के रेटिना का ईलाज भी अलख नयन मंदिर द्वारा किया जा रहा है।
डॉ. साकेत आर्य ने बताया कि प्री-मेच्योर बच्चों के आंखों के रेटिना की जांच उसके जन्म के 4 सप्ताह बाद से की जा सकती है। उन्होंने बताया कि देश में करीब 10.40 प्रतिशत व्यक्ति टाईप-2 डायबिटीज के मरीज है और उसमें से 10 प्रतिशत मरीज में रेटिनापैथी नामक बीमारी पायी जाती है। दस वर्ष से अधिक की डायबिटीज हो चुकी रोगियों में यह निश्चित है कि उसका प्रभाव आंखों पर पड़ेगा। इसलिये उन्हें अपने रेटिना को बचाये रखने के लिए उसकी जांच नियमित रूप से कराते रहना चाहिये। प्री-मेच्योर पैदा होने वाले कुल बच्चों में से 22 प्रतिशत बच्चों में रेटिनापैथी नामक बीमारी पायी जाती है जिसमें से साढ़े तीन प्रतिशत बच्चों को इलाज की आवश्यकता होती है।

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